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World Disability Day 2022: शारीरिक तौर पर जो भी हो, मानसिक रूप से कभी न बनें ‘विकलांग’

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भगवान कब किसे क्या दे दे और कब किससे क्या छीन लें ये कोई नहीं जानता। दुनिया में 8 प्रतिशत लोग Disability का शिकार हैं। दिव्यांगता अभिशाप नहीं है क्योंकि शारीरिक अभावों को यदि प्रेरणा बना लिया जाए तो दिव्यांगता व्यक्तित्व विकास में सहायक हो जाती है। यदि सोच सही रखी जाये तो अभाव भी विशेषता बन जाते हैं। दिव्यांगता से ग्रस्त लोगों का मजाक बनाना, उन्हें कमजोर समझना और उनको दूसरों पर आश्रित समझना एक भूल और सामाजिक रूप से एक गैर जिम्मेदाराना व्यवहार है।

हर साल 3 दिसंबर को World Disability Day यानी अन्तर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस मनाया जाता है। इसे हर साल मनाने का लक्ष्य शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम व्यक्तियों के प्रति समाज के रवैये में बदलाव लाना है। दरअसल साल 1976 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा की तरफ साल 1981 को World Disability Day के रूप में घोषित किया गया था। 1992 से इसे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाने की शुरुआत हुई। साल 2007 तक इस दिन को “International Day of Disabled Persons” कहा जाता था।

1980 के दशक में अमेरिका की डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी ने विकलांगो के लिए Handicapped की जगह Differently Abled शब्द के इस्तेमाल पर जोर दिया। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में शब्द disabled 20वीं शताब्दी के आखिर में आया। दिसंबर 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘मन की बात’ में विकलांग को दिव्यांग नाम दिया। पीएम मोदी के सुझाव के बाद हिंदी भाषा में विकलांग की जगह ‘दिव्यांग’ चलन में है।

2001 की जनगणना के मुताबिक, भारत में लगभग 21 मिलियन (2.1 करोड़) से ज्यादा दिव्यांग थे। जिसमें से 12.6 मिलियन पुरुष व 9.3 मिलियन महिलाएं थी। उस समय ये तादाद देश की कुल आबादी की 2.1 फीसद बताई गई थी। बता दें कि आज दुनिया में 8 प्रतिशत लोग दिव्यांगता का शिकार हैं।

अक्सर देखा जाता है कि शरीर के किसी अंग से लाचार व्यक्तियों में ईश्वर प्रदत्त कुछ खास विशेषताएं होती हैं। विकलांग शब्द उन्हें हतोत्साहित करता है। देश के लोगों ने विकलांगों को दिव्यांग तो कहना शुरू कर दिया लेकिन लोगों का उनके प्रति नजरिया आज भी नहीं बदल पाया है। आज भी समाज के लोगों द्वारा दिव्यांगों को दयनीय दृष्टि से ही देखा जाता है। भले ही देश में अनेकों दिव्यांगों ने विभिन्न क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया हो मगर लोगों का उनके प्रति वही पुराना नजरिया बरकरार है।

जो लोग किसी दुर्घटना या प्राकृतिक आपदा का शिकार हो जाते हैं अथवा जो जन्म से ही दिव्यांग होते हैं, उनके बारे में हमें यह समझना होगा कि उनका जीवन भी हमारी तरह है और वे अपनी कमजोरियों के साथ उठ सकते हैं। इसलिए किसी दिव्यांग की मदद तो कीजिये लेकिन उनको दयनीय दृष्टि से न देखिये क्योंकि उसे भी समाज में सर उठाके चलने का अधिकार है।

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