BJP सांसद पर हमले की सज़ा सिर्फ DSP प्रतापगढ़ को ? क्या PPS अधिकारियो के ही हाथों में होते हैं सर्वाधिकार ?

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Sangam Lal Gupta

प्रतापगढ़ में BJP सांसद पर हुए हमले के बाद जब ये आशा की जा रही थी कि शीघ्र ही हमलावरों पर विधिक कार्यवाही अमल में लाई जायेगी, लेकिन वो कार्यवाही इतनी अप्रत्याशित होगी ये कल्पना से पूरी तरह से परे था.. आख़िरकार हमलावरों से पहले अतिशीघ्र जांच करवा कर पुलिस में आंतरिक खोट निकाल लिया गया और लालगंज के क्षेत्राधिकारी जगमोहन सिंह को सस्पेंड कर दिया गया.

कहना गलत नहीं होगा कि मामला सांसद का था इसलिए कार्यवाही भी उस स्तर की होनी थी. इस मामले में अगर सिपाही और दरोगा तक विषय सीमित रहता तो संभवतः सांसद जी के पद और गरिमा के अनुरूप न माना जाता, उपमुख्यमंत्री महोदय का निश्चित कार्यवाही के लिए किया गया ट्वीट भी था, इसलिए विषय में संजीदगी दिखानी थी.

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अराजपत्रित की सीमा जहाँ समाप्त होती वहां से राजपत्रित की श्रेणी में पहले नंबर पर आते थे क्षेत्राधिकारी जगमोहन। यद्द्पि अब लगभग ये मान लिया गया है कि बाकी सभी तत्पर थे और दोष मात्र DSP जगमोहन का रह गया वरना शायद प्रमोद तिवारी की हिम्मत न पड़ती। पता नहीं ऐसा सच में है या नहीं क्षेत्राधिकारी पर हुआ एक्शन तो यही बता रहा है.

यहाँ ये भी ध्यान रखने योग्य है कि जिला प्रतापगढ़ कमिश्नरेट के दर्जे में नहीं आता. दूसरे शब्दों में इसका अर्थ ये हुआ कि वहां पर पुलिस बल के राजपत्रित अधिकारियो को निर्णय लेने के अधिकार भी सीमित हैं। किसी भी बड़े मामले में बड़ा निर्णय मजिस्ट्रेट की सहमति से हो ऐसी अपेक्षा की जाती है और स्वतः वीर बहादुर बन जाने से कई बार गेंद अपने ही गोल में चली जाया करती है.

कुल मिला कर शासकीय विवेचना के सारांश में प्रतापगढ़ की घटना में पुलिस विभाग में ही DSP जगमोहन के उच्चाधिकारी के अतिरिक्त वो सभी मजिस्ट्रेट वाली ताकत रखने वाले बेगुनाह साबित हुए और हमलावरों के बाद अगर कोई दोषी मिला तो वो क्षेत्राधिकारी जगमोहन। हैरान न हों, ये पुलिस विभाग है, यहाँ ये सब आम बात है.. पर आम बात की भी सीमा शायद तय है.. वरना इस कार्यवाही का दायरा थोड़ा और बड़ा हो सकता था.

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मीडिया के बाकी वर्ग के लिए भी शायद ये ध्यान देने का विषय नहीं क्योकि जो मज़ा और चटकारा राजनीति की लड़ाई कवर करने में है वो अधिकारियो की व्यथा और पीड़ा को सामने लाने में कहाँ ? आखिर TRP के लिए जवाब उन्हें भी अपने आकाओ को देना पड़ता ही होगा। पर मीडिया के वो कर्मी अपने आकाओ के फैसले का मुखर विरोध बेझिझक कर सकते हैं पर पुलिस विभाग में DSP जगमोहन के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं है।

हालांकि जनभावना के सम्मान को भी सर्वोपरि रखना जरूरी समझा जाता है और जाहिर सी बात है कि सांसद जी के पक्ष के मुकाबले DSP जगमोहन का जनसमर्थन न के बराबर होगा। यद्द्पि हर बदलाव से सबसे अधिक प्रभावित समाज का मध्यमवर्गीय वर्ग पहले होता है. मध्यमवर्गीय वर्ग को उसके नीचे वर्ग वाले बड़े सुकून से मज़े करता हुआ मानते हैं लेकिन वो बेचारा मध्यमवर्गीय अक्सर किसी न किसी उच्चवर्गीय पर आश्रित रह कर जैसे तैसे अपना भरण पोषण करता रहता है.

पुलिस विभाग में DSP , ASP जैसे पद मध्यमवर्गीय श्रेणी में माने जाते हैं जो निचले अधिकारियो की दृष्टि में बेहद सुकून से हैं पर उनकी जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व किस स्तर पर होते हैं ये समझना है तो प्रतापगढ़ के CO साहब के ही रूप में देख सकते हैं जिन्हे इतने बड़े जिले में इतने अधिकारियो कर्मचारियों की भीड़ में तत्परता से दोषी मान लिया गया और कार्यवाही भी कर दी गई.

PPS अधिकारी पहले से ही अपने प्रमोशन और अन्य बुनियादी समस्याओं की आवाज शासन से ले कर अदालत तक उठाते रहे हैं. अगर समाधान के तौर पर अब तक देखा जाय तो शून्यता ही पाई जाएगी। उनके ही बैच के PCS अधिकारी उनसे कहीं आगे निकले दिखाई दे जाते हैं. ऐसे में इस मामले में दोषी बनाये गए जगमोहन के मन में कैसे कैसे विचार घूम रहे होंगे इसे बस वही समझ सकते हैं.

इस मामले में बतौर पत्रकार निष्पक्ष रूप से ये भी समझने का प्रयास कर रहा कि कथित हमलावर पक्ष यानि Congress के प्रमोद तिवारी और पीड़ित पक्ष BJP सांसद संगमलाल गुप्ता जैसे ताकतवर हस्तियों से और हस्तियों की पूर्व में सीधी बातचीत आदि किस से रही होगी। क्या इन दोनों के स्तर क्षेत्राधिकारी तक रहे होंगे या ये अपने पहले की समस्याओं को कुछ ऊपर तक रखते रहे होंगे ?

यदि मामला क्षेत्राधिकारी तक सीमित रहा हो तब तो सज़ा उचित प्रतीत होती है. क्या इस मामले DSP को दंडित करने से पहले ये भी देखा गया होगा कि सभा की अनुमति किस ने दी ? उस सभा में भीड़ आदि की सीमा क्या निर्धारित थी ? अनुमति देते समय किन किन लिखित प्रावधानों पर दस्तखत लिए गए रहे होंगे ? आदि आदि, जहाँ तक व्यक्तिगत समझ है तो अनुमति देने का अधिकारी DSP साहब को नहीं रहा होगा।

फिर किन तथ्यों और तर्को के अनुसार उन्हें दोषी ठहरा दिया गया और कार्यवाही का पात्र बना दिया गया ये संभवतः कभी सामने नहीं आएगा और गोपनीयता का पूरा ध्यान रखा जाएगा। पर एक विशेष प्रकार की सोच से महज जनता के अंदर छिपे कुछ खास सोच वाले ही नहीं बल्कि कुछ और उच्च स्तरीय लोग भी ग्रसित हैं और यदि कुछ पत्रकारों का सबसे आसान निशाना पुलिस होती है तो उसकी जड़ कहीं और ही पाई जायेगी।

कुछ समय पहले झांसी में एक DSP साहब द्वारा दिया गया इस्तीफा भी सुर्खियां बना था पर सुर्खियां समस्या का निदान अथवा समाधान नही बन पाईं। आख़िरकार रामराज्य में रामायण का श्लोक भी लागू होना स्वाभाविक है कि – “समरथ को नहिं दोष गुसाईं”..

बेहतर होगा कि सीओ जगमोहन से शिक्षा ले कर बाकी अधिकारी भी अपनी सीमाओं का पुनरावलोकन करें।। पर अंत में फिर वही सवाल खड़ा होगा कि वो आखिर करें तो क्या करें ? फिलहाल हेडलाइन के साथ ही समापन कि सांसद पर हमले की सज़ा सिर्फ DSP प्रतापगढ़ को ही क्यों ? क्या PPS अधिकारियो के ही हाथों में होते हैं सर्वाधिकार ?

रिपोर्ट-

राहुल पांडेय ( Journalist )
मो0- 9598805228