देश ने क्या कुछ खोया और क्या पाया, जानिए इस Independence day

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स्वतंत्र भारत आज अपना 76वां Independence day मना रहा है, यह अवसर औपनिवेशिक शासन से आजादी का जश्न मनाने, देश के सैंकड़ों वीर स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान और उनके बलिदान को स्मरण करने के साथ-साथ आत्मचिंतन करने का भी है। पिछले सात दशकों में क्या कुछ बदला है, क्या कुछ बदलना शेष है और एक महान राष्ट्र के तौर पर भारत में क्या संभावनाएं हैं तथा उसके समक्ष कौन-सीचुनौतियां मुंहबाए खड़ी हैं? स्वाभाविक रूप से इस पर मंथन और आकलन करने का यह उपयुक्त समय है।

अक्सर भारत में एक वर्ग, जिसमें राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी, तथाकथित एन.जी.ओ. और वामपंथी शामिल होते हैं-उसके द्वारा दावा किया जाता है कि देश में अमीर और अमीर, तो गरीब और गरीब होते जा रहे हैं। पूरा सच क्या है? निर्विवाद रूप से हमारे देश में गरीबी अभिशाप है। आज भारत की आबादी 133 करोड़ से अधिक है, उसमें गरीबी की स्थिति को लेकर कई वैश्विक रिपोर्टें आई हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, अत्यंत गरीब लोगों की संख्या भारत में घटकर 7.3 करोड़ हो गई है और वर्ष 2022 तक इनकी संख्या और कम हो सकती है। उनका अध्ययन यह भी कहता है कि प्रति मिनट 44 भारतीय अत्यंत गरीबी की श्रेणी से बाहर निकल रहे हैं। वहीं संयुक्त राष्ट्र ने अपनी हालिया रिपोर्ट में उल्लेख किया है कि अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों के अनुरूप, वर्ष 2005-06 में भारत के 55.1 प्रतिशत लोग गरीबी में थे, जो 2015-16 में घटकर 27.9 प्रतिशत हो गए हैं।

जनसंख्या और गरीबी

इन अंतर्राष्ट्रीय दावों के बीच इस वर्ष अप्रैल में तत्कालीन केन्द्रीय वित्तमंत्री अरुण जेतली ने बताया था, ‘‘2011 की जनगणना के अनुसार, देश की 21.9 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर कर रही थी। वृद्धि की वर्तमान दर के आधार पर गणना करें तो यह अनुपात और कम होकर 17 प्रतिशत पर आ गया होगा।’’ अब यदि 17 प्रतिशत को आधार बनाएं तो यह बात सही है कि एक बड़ा राष्ट्र और विश्व में दूसरी सर्वाधिक आबादी (133 करोड़ से अधिक) होने के कारण भारत की कुल जनसंख्या का 17 प्रतिशत अर्थात् 22.5 करोड़ लोगों का गरीब होना, एक बहुत बड़ी संख्या है, जो विश्व के देशों की कुल जनसंख्या से कहीं अधिक है।

उपरोक्त सभी आंकड़ों के बीच हमें यह स्वीकारना होगा कि देश में न्यूनतम मजदूरी बढऩे, कर संग्रह में वृद्धि और अर्थव्यवस्था का आकार बढऩे से जनहितैषी कार्यों में आई तीव्रता के कारण देश में निरंतर गरीबी घट रही है। किन्तु इसका दूसरा पक्ष यह है कि जिस गति से निर्धनता कम हो रही है, उससे कहीं अधिक तेजी से अधिकांश लोगों (अधिकतर युवा) की आकांक्षाएं ज्वार का रूप धारण कर चुकी हैं। परिणामस्वरूप, देश के एक बड़े वर्ग में अपने वेतन या आय के प्रति कुंठा बढ़ती जा रही है।

कानून-व्यवस्था

यह निर्विवाद सत्य है कि Independence day के 75 वर्ष बाद देश में कानून-व्यवस्था जितनी सुदृढ़ होनी चाहिए थी, उतनी तो नहीं है लेकिन ठीक जरूर है। चाहे दिल्ली हो या जालंधर या फिर देश का कोई भी अन्य स्थान, लूटपाट, अपहरण और हत्या जैसे ढेरों आपराधिक मामले सामने आते रहते हैं। इस परिदृश्य में पड़ोसी देशों की स्थिति क्या है? इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बंगलादेश में मजहब और स्वयं को श्रेष्ठ व सच्चा मुसलमान सिद्ध करने के नाम पर ङ्क्षहसा चरम पर है। पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों (हिंदू-सिखों) की स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां उनकी जनसंख्या विभाजन के समय 24 प्रतिशत थी जो घटकर आज 2 प्रतिशत से नीचे पहुंच गई है। यह अलग बात है कि वास्तविकता इससे कहीं अधिक भयावह है। उसी तरह, बंगलादेश में अल्पसंख्यक 28 प्रतिशत से घटकर 8 प्रतिशत भी नहीं रह गए हैं।

भारत के अन्य पड़ोसी, साम्यवादी चीन में अधिनायकवादी शासन और रूढ़-पूंजीवादी आर्थिकी के कारण मानवाधिकारों का गला घोंटा जा रहा है। वहीं भारत में अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुस्लिमों को बहुसंख्यकों की भांति और कई मामलों में अधिक संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं, साथ ही उनकी आबादी विभाजन के समय 10 प्रतिशत थी जो बढ़कर लगभग 15 प्रतिशत हो गई है। यूं तो देश में सख्त कानूनों की कोई कमी नहीं है और पुलिस भी पहले से अधिक सक्षम और आधुनिक हो गई है, किन्तु बलात्कार, यौन-उत्पीडऩ, घरेलू-हिंसा और मासूम बच्चियों के साथ दरिंदगी जैसे गंभीर अपराधों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा है। क्या यह सत्य नहीं कि इस स्थिति के लिए समाज में नैतिक शिक्षा और संस्कारों के पतन व भौतिक सुख के साथ पाश्चात्य संस्कृति के प्रति आकर्षण सर्वाधिक जिम्मेदार हैं? महिलाओं की भागीदारी

यदि कुछ संतोष करने लायक बात है तो वह आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक रूप से महिलाओं की भागीदारी का लगातार बढऩा है। चाहे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री जैसा उच्च संवैधानिक पद हो या फिर विदेश और रक्षा जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय, इन स्थानों पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। बोर्ड परीक्षा के परिणामों में लड़कियों ने न केवल सुधार किया है, लेकिन पिछले डेढ़-दो दशकों से लड़कों को पछाड़ कर लगातार प्रतिवर्ष प्रथम स्थान भी अर्जित कर रही हैं। यह सही है कि देश में आज शिक्षा के साथ चिकित्सा के क्षेत्र में भी व्यापक सुधार हुआ है और गंभीर रोगों के प्रति लोगों की जागरूकता भी बढ़ी है। निम्न आय और गरीबों के लिए केन्द्र सरकार के अतिरिक्त विभिन्न सरकारों द्वारा सस्ता उपचार भी उपलब्ध करवाया जा रहा है।

किन्तु एक कटु सत्य यह भी है कि इस क्षेत्र में बाजारीकरण ने ठगी को बढ़ावा देकर समाज में कत्र्तव्य की भावना को लगभग समाप्त कर दिया है। पहले सम्पन्न परिवारों की ओर से अपनी संस्कृति के अनुरूप मुफ्त चिकित्सा और शिक्षा हेतु एक ट्रस्ट की स्थापना कर अस्पताल और विद्यालयों का निर्माण कराया जाता था, किन्तु आज आधुनिक उपचार और शिक्षा के नाम पर लोगों को ठगा जा रहा है। इसी तरह, हमारी संस्कृति में पानी पिलाना पुण्य के समकक्ष माना गया है। किन्तु आज उसी देश में नामी कम्पनियां आधा लीटर बोतल के लिए 50-60 रुपए वसूल रही हैं। विश्व में कुछ दशक पहले तक भारत की पहचान राजा-महाराजा, हाथी, घोड़ों और सपेरों के देश के रूप में होती थी, किन्तु अब इसमें व्यापक परिवर्तन आया है। आज हमारा देश दुनिया की सबसे उभरती हुई आर्थिक ताकत के साथ अमरीका, रूस और चीन के बाद विश्व की चौथी अंतरिक्ष महाशक्ति बन चुका है। हाल ही में चंद्रयान-2 मिशन की ऐतिहासिक सफलता से पहले इसी वर्ष मार्च में भारत, अंतरिक्ष की निचली कक्षा में लाइव सैटेलाइट को मार गिराने की क्षमता वाला देश भी बन गया था।

भारतीय का परिचय

परिवर्तन ऐसा आया है कि यदि कोई भारतीय आज अमरीका या फिर किसी यूरोपीय देश में स्वयं का परिचय देता है तो वहां के लोग यह मानकर चलते हैं कि वह भारतीय या तो कोई चिकित्सक या वैज्ञानिक होगा अथवा फिर कोई योगाचार्य। आज विश्व जिस अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को प्रत्येक वर्ष 21 जून (2015 के बाद) को मनाता है, वह दुनिया को भारत की सनातन संस्कृति के गर्भ से निकला अध्यात्म रूपी एक उपहार है। दुख है कि सदियों के अथक प्रयासों के बाद भी कई सामाजिक बुराइयां खत्म नहीं हुई हैं। राजनीतिक स्वार्थ के लिए जातिवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है। भ्रष्टाचार अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है तो बेरोजगारी चिंता का विषय। हमारे सामने ऐसे युवाओं की बड़ी फौज खड़ी है, जो न केवल बेरोजगार हैं, बल्कि प्रतिस्पर्धा के दौर में किसी रोजगार के योग्य ही नहीं हैं। इन सभी चुनौतियों के बीच शुभ संकेत यह है कि हम दुनिया के सर्वाधिक युवा लोकतंत्र हैं। एक औसत भारतीय से पूछिए कि क्या वह पड़ोस के किसी देश-पाकिस्तान, बंगलादेश, म्यांमार, नेपाल या चीन में बसना चाहेगा तो अधिकांश का उत्तर न ही होगा। यही हमारी सफलता और विशेषता है, जिसे हमने गत 75 वर्षों में प्राप्त किया है।

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