पिछले दो दशक से भी ज्यादा समय से Afghanistan जंग की आग में जल रहा है। वहां इतनी लाशें दफन हैं कि अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। अमेरिका और अन्य देशों की बड़ी-बड़ी कार्रवाइयों ने अभी तक अलकायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकवादी संगठनों का खात्मा नहीं कर पाई और अब अमेरिका और नाटो देशों के सैनिकों का Afghanistan से जाना उनके लिए जीवनदायी साबित होगा। दुनिया को डर है कि यह इस्लामिक संगठन अब और बड़े बनकर उभरेंगे जिससे पूरी दुनिया को खतरा होगा। तालिबान कानून में महिलाओं के लिए कड़े नियम हैं, बच्चियों को स्कूल तक जाने से रोका जाता है। उनके ऊपर कड़े प्रतिबंध होते हैं जिसके लेकर कई महिला संगठनों ने विश्वस्तर तक इस पर अपनी आवाज़ बुलंद की है।

तालिबान हमेशा से शरिया कानून के पक्ष में रहा है और उसके तालिबानी कानून में महिलाओं को लेकर काफी सख्त नियम कानून हैं। यही वजह है कि जब तक तालिबान Afghanistan में मजबूत था तब तक महिलाओं के लिए वहां जीवन जीना बेहद दयनीय था। लड़कियों के लिए तो स्कूल की कल्पना करना भी मुश्किल था लेकिन जब से अमेरिकी फौजों ने वहां मोर्चा संभाला था तब से Afghanistan की महिलाओं और लड़कियों की हालत में सुधार हुआ था 2001 में Afghanistan में 9.2 मिलीयन छात्र पढ़ाई कर रहे थे, जिसमें 3.7 मिलियन लड़कियां थीं लेकिन अमेरिका के फैसले के बाद अब भी वहां इस तरह से लड़कियां पढ़ पाएंगी इस पर संदेह है। तालिबानी किसी भी कीमत पर Afghanistan में इस्लामी शासन लागू करना चाहते हैं, उसके लिए वह कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। अब अमेरिकी सैनिकों और नाटो देशों के सैनिकों का वापस चले जाना उनके लिए खुली छूट होगी क्योंकि Afghanistan की सरकार में इतनी शक्ति नहीं है कि वह तालिबान को पूरी तरह से रोक सके।

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