यमुना की सहायक नदी के रुप में जानी जाले वाली मैं करबन कभी खेतों में हरा सोना उगाकर खुशहाली बखेरती थी। जब पशु-पक्षी मेरे नीर से अपनी प्यास बुझाते थे तो बहुत सुकून महसूस करती थी। कभी किसी के लिए बाढ़ बनकर मुसीबत नहीं बनी। पशु-पक्षियों के झुंड मेरे घाट पर कलवर करते थे वह दृश्य बड़ा आनंदित हुआ करता था। आज दृश्य कुछ और हो गया है, आज मेरी दुर्दशा कोई देखने वाला नहीं है। आज में कराह रही हूं। सांसें अटकी हैं। अकाल मौत की तरफ  बढ़ रही हूं। कोई सुध नहीं ले रहा। कभी फसलों के लिए संजीवनी बनी मैं आज इतिहास के पन्नों में सिमटती जा रही हूं। कभी दूसरों की प्यास बुझाती थी आज खुद प्यासी हूं। सूखे की काली छाया ने मुझे बहुत जख्म दिए हैं। कभी भागीरथ अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा को धरती पर लाए थे। आज मुझे अपने उद्धार के लिए भागीरथ की तलाश है।

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करबन नदी बुलंदशहर के खुर्जा क्षेत्र से निकल कर अलीगढ़ के गभाना से खैर क्षेत्र में प्रवेश करती है। इगलास होते हुए हाथरस से निकल कर आगरा के एत्मादपुर के समीप युमना में विलय हो जाती है। इस लिए इसे यमुना की सहायक नदी कहा जाता है। कभी इन क्षेत्रों में हजारों एकड़ भूमि को सींचती थी लेकिन आज सूखी पड़ी है। सिर्फ बारिश के समय ही नदी के आंचल में पानी की धारा नजर आती है। अलीगढ़ जिले में ही नदी की लंबाई लगभग 70 किमी. है। पहले बहती हुई नदी की धारा क्षेत्र के वाटर लेविल को रिचार्ज करने का काम करती थी, लेकिन आज इसके आस-पास का क्षेत्र डार्क जॉन घोषित किया जा चुका है। नदी में जल न होने के कारण क्षेत्र को डार्क जॉन से नहीं उवार पा रही। नदी के संरक्षण के लिए लोगों को आगे आना होगा।

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