नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने हाल ही में संसद भंग कराने का फैसला लिया था और इसी फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में तीन याचिकाएं दायर की गई हैं।

बता दें सोमवार को नेपाल के प्रधानमंत्री ओली ने राष्ट्र के नाम संबोधन करते हुए कहा कि उनके पास फिर से चुनाव कराने और बहुमत हासिल करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। पार्टी के भीतर विवाद इतना बढ़ चुका था कि उनकी सरकार ठीक तरह से काम नहीं कर पा रही थी।

ओली ने गिनाई सरकार की उपलब्धियां

ओली ने अपनी सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि उनके कार्यकाल में नेपाल का नया नक्शा प्रकाशित हुआ है. ओली ने कहा कि उनकी सरकार ने लोगों के हित में कई काम किए गए है। और राष्ट्रवाद के लिए मजबूती से खड़ी हुई, भारत के साथ सीमा वार्ता शुरू की और चीन के साथ व्यापार और यातायात समझौते को अमल कराने के लिए तेजी से  काम किया है। उन्होने कहा उनकी सरकार ने संप्रुभता और क्षेत्रीय अखंडता की सुरक्षा के मामले में बेहतरीन काम किया। उन्होने कहा, मैंने जब कालापानी और लिपुलेख को शामिल करते हुए देश का नया नक्शा जारी किया तो मुझे राष्ट्र का गर्व बढ़ाने वाले काम के लिए परेशान किया गया।

सुप्रीम कोर्ट के प्रवक्ता भद्रकाली पोखरेल ने कहा कि संसद भंग करने के खिलाफ तीन याचिकाएं दायर की गई हैं. याचिकाकर्ता दिनेश त्रिपाठी ने कहा, संविधान के तहत, प्रधानमंत्री के पास संसद भंग करने का कोई औचित्य नहीं था. ये पूरी तरह से असंवैधानिक है. मैं सुप्रीम कोर्ट से इस पर स्टे ऑर्डर लाने की कोशिश करूंगा. नेपाल के तमाम राजनीतिक विश्लेषक ओली के संसद भंग करने के फैसले की आलोचना कर रहे हैं। नेपाल के जाने-माने राजनीतिक विश्लेषक श्याम श्रेष्ठ कहते हैं। उन्होंने अपने संबोधन में देश से झूठ बोला है। ओली देश में अस्थिरता की मुख्य वजह हैं और जिन हालात में देश है, उसके जिम्मेदार भी वो खुद ही हैं। ओली के पास देश चलाने का शानदार मौका था लेकिन वो असफल रहे।

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