भारत सरकार के मंत्री पीयुष गोयल  ने आरोप लगाया है की किसान आंदोलन को किसी पार्टी से नहीं बल्कि चीन समर्थक माओवादी और लेफ्ट समर्थक फंड मुहैया करा रहे हैं । किसानों को आंदोलन पर लगाए रखने के लिए पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है जिससे भारत सरकार इस बिल को वापस ले ले । किसान आंदोलन को चलाने वाले किसान संगठनों ने कृषि कानून में बदलाव की जगह इसे वापस लेने से कम पर बात करने से इनकार कर दिया है । किसानों के मुताबिक कॉट्रेक्ट फार्मिंग से किसान उद्योगपतियों का गुलाम बन जाएगा । किसानों ने सरकार पर दबाब बनाने के लिए भारतीय कंपनी रिलायंस और अडानी जैसी स्वदेशी कंपनियों का बहिष्कार करने का आहवान किया है। किसानो ने रिलायंस टावरों पर किसान यूनियनों का झंड़ा तक लगा दिया है । किसान लगातार सरकार से कई दौर की वार्ता कर चुके हैं लेकिन सभी मुलाकातें बेनतीजा रही हैं ।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक किसानों से बातचीत कर नए कृषि बिल की खासियतों के बारे में बता चुके हैं लेकिन किसान अब आर पार की लड़ाई की बात कर रहे हैं । किसानों से बातचीत का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में भी उठ चुका है माना जा रहा है कि भारत सरकार के कई चीनी कंपनियों पर रोक लगाने और आत्मनिर्भर भारत का नारे से चीन सकते में है। भारत सरकार ने घलवान घाटी में चीनी सेना के दुस्साहस के बाद कई चीनी एप्स पर रोक लगा दी थी । भारत सरकार ने इसके साथ ही सरकारी उपक्रमों में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले चीनी उत्पादों पर भी रोक लगा दी है जिससे  चीन को अरबों डॉलर का नुकसान हो रहा है । वही सरकार भारतीय उद्यमियों से भारत में उत्पादन ईकाईकायों को बढ़ाने को कह चुके हैं । इन सब से खिसिया कर चीन माओवादी ताकतों के जरीए किसान आंदोलन को हवा दे रहा है जो पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं । भारत में 600 के करीब किसान संगठन में जिनमें से 515 किसान संगठनों ने कृषि बिल के समर्थन में सरकार को पत्र सौंपा है ।

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