सिंधुताई सपकाल की काहनी बेहद मार्मिक है। जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखने के बाद, संघर्षों से लड़ने के बाद आज सिंधुताई इस मुकाम पर पहुंची है।

केबीसी के सीजन-11 में पिंक साड़ी में एक बुजुर्ग महिला ने दस्तक दी। जिन्हें देखकर अमिताभ बच्चन अपनी सीट से उठ खड़े हुए और पैर छू कर उनका स्वागत किया। देश के हाजारों अनाथ बच्चों की मां सिंधुताई सपकाल जो कठोर हालातों से बनी चिंधी से सिंधु।

सिंधुताई सपकाल की काहनी बेहद मार्मिक है। जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखने के बाद, संघर्षों से लड़ने के बाद आज सिंधुताई इस मुकाम पर पहुंची है। महाराष्ट्र के वर्धा में ‘पिंपरी मेघे’ गाँव मे जन्मी ताई को बचपन में अभिशाप माना गया क्योंकि वह एक बेटी थी और इसलिए नाम पड़ा चिंधी अर्थात कपडे का फटा हुआ टुकड़ा। किसी को क्या पता था यही फटा हुआ कपड़ा एक दिन अपने आंचल में समेट लेगा दुनियांजहां के मासूमों को।

बचपन में मां हमेशा नाराज ही रही। मां से दुतकार ही मिली लेकिन पिता सिंधु से बेहद प्यार करते थे। वो अपनी चिंधी को पढ़ाना चाहते थे इसलिए पत्नी से लड़कर ही सही लेकिन चिंधी को स्कूल भेजा। कक्षा चार तक ही पढ़ पाई थी चिंधी कि 10 साल की उम्र में एक 30 साल के व्यक्ति से नन्हीं चिंधी का विवाह कर दिया गया।

हजारों अनाथ बच्चों की मां सिंधुताई सपकाल की कहानी

पति का नाम था श्रीहरी सपकाल। 20 की उम्र आते-आते चिंधी 3 बच्चों की मां बन चुकी थी। फिर एक दिन आई वह आंधी जिसने जन्म दिया सिंधुताई को। दरसल मुखिया के खिलाफ आवाज बुलंद करने की सिंधुताई को सजा मिली। पति ने मुखिया की बातों में आकर गर्भवती चिंधी को बड़ी बेरहमी से पीटकर घर से बाहर निकाल दिया। गोशाला में चिंधी ने एक बच्ची को जन्म दिया।

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बड़ी उम्मीदों से अपनी बच्ची को लेकर सिंधुताई अपनी मां के घर पहुंची लेकिन मां ने अपने साथ रखने से इंकार कर दिया। पिता का साया पहले ही सिंधी के सर से उठ चुका था। इसके बाद टूट चुकी चिंधी ने अपनी जीवन लीला समाप्त करने की ठानी लेकिन तभी रास्ते में कुछ ऐसा हुआ कि सिंधुताई को अपना यह विचार त्यागना पड़ा। दरसल रास्ते में उन्हें एक अधमरा भिखारी मिला जो पानी के लिए तड़प रहा था। चिंदी ने उसे पानी पिलाया और थोड़ी रोटी भी खिलाई। अब भिखारी को थोडा होश आया। इस वाकये ने चिंदी का मन बदल डाला। उसने सोचा ये दूसरा जीवन उसे बेसहारों को सहारा देने के लिए ही मिला है। इसी पल इसी क्षण चिंदी की मौत हुई और चिंदी अब सिंधु बन गयी।

हजारों अनाथ बच्चों की मां सिंधुताई सपकाल की कहानी

सिन्धुताई अपनी बेटी के साथ रेलवे स्टेशन पर रहने लगी। पेट भरने के लिए भीख माँगती और रात को खुद को और बेटी को सुरक्षित रखने के लिए शमशान में रहती। इसी बीच सिंधुताई को ख्याल आया कि ना जाने देश में ऐसे कितने अनाथ बच्चें होंगे जिन्हें मां के प्यार की जरूरत होगी। बस फिर क्या था सिंधु ने ठाना अब जो भी अनाथ बच्चा उनके पास आएगा वह उसे अपना लेगी। उन्होने अपनी खुद कि बेटी को ‘श्री दगडुशेठ हलवाई, पुणे, महाराष्ट्र’ ट्रस्ट मे गोद दे दिया ताकि वे सारे अनाथ बच्चों की माँ बन सके।

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हजारों अनाथ बच्चों की मां सिंधुताई सपकाल की कहानी

धीरे धीरे सिन्धु ताई की जान पहचान कुछ आदिवासियों से हो गयी। अब सिंधुताई ने उनके हक़ के लिए भी लड़ने की ठानी। सिंधुताई अब भजन गाने के साथ-साथ भाषण भी देने लगी थी और धीरे धीरे लोकप्रिय होने लगी थी। आज उनके 1000 से भी ज्यादा बच्चें हैं। जिनमें कोई वकील तो कोई डॉक्टर है।

कविताओ की शौक़ीन सिंधुताई अक्सर अपने भाषणों में गर्व से कहती हैं- “लकीर की फ़कीर हूँ मैं, उसका कोई गम नहीं,

नहीं धन तो क्या हुआ, इज्ज़त तो मेरी कम नहीं!”