जलेबी, देसी घी के लड्डू और खस्ता-कचौड़ी के मुरीद थे Mulayam Singh Yadav

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इंसान इस दुनिया से चला जाता है लेकिन उसकी बातें बाद में याद आती हैं। ऐसे ही आज नेता जी के जाने के बाद उनके चाहने वाले उनको याद कर हैं। बात 1966 की थी। Mulayam Singh Yadav राज्य मंत्री बने थे तो अनुसूचित जातियों के लिए सीटें भी आरक्षित करवाई थी। दलितों और पिछड़ों को सम्मान देने पर मुलायम को भी पिछड़ी जातियों का जमकर सहयोग मिला। इसका उन्हें राजनीति में काफी फायदा मिला। इसके बाद जसवंतनगर सीट पर 1968,1974 और 1977 में हुए मध्यावधि चुनाव में Mulayam Singh Yadav को जीत हासिल की।

जब Mulayam Singh Yadav ने सर्वहारा के हितों के लिए आवाज़ उठाई तो लोगों द्वारा उन्हें धरतीपुत्र की उपाधि दी गई। Mulayam Singh Yadav की समाजवादी विचारधारा और जनता में अच्छी पकड़ ने उन्हें यूपी के सीएम की कुर्सी तक पहुंचाया था। Mulayam Singh Yadav हमेशा से क्रांतिकारी स्वभाव के रहे। महज 14 साल की उम्र में उन्होंने केंद्र में कांग्रेस सरकार के खिलाफ निकाली गई रैली में हिस्सा लिया था। राम मनोहर लोहिया के आह्वान पर मुलायम नहर रेट आंदोलन में भी शामिल हुए थे। वहीं, इस आंदोलन का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। इसके बाद साल 1954 में उन्होंने राजनीति में अपने सफर की शुरुआत की थी। 1989 में जनता दल से चुनाव जीतकर मुख्यमंत्री बने।

Mulayam Singh Yadav को धरती पुत्र भी कहा जाता था। Mulayam मिठाइयों के बेहद शौकीन थे। वह जब भी इटावा आते थे तो बलदेव चौराहा स्थित बलदेव मिष्ठान भंडार जाकर मिठाई जरूर खाते थे। करीब तीन माह पहले ही वह यहां गए थे और छककर मिठाइयां खाई थीं। बलदेव मिष्ठान के संचालक सुरेश यादव भी नेताजी के मुरीद हैं। वह कहते हैं नेताजी को मीठे में सबसे ज्यादा देसी घी की जलेबी और बूंदी के लड्डू पसंद हैं। इसके अलावा उन्हें खस्ता-कचौड़ी भी खूब पसंद थे। खुद भी खाते थे और लोगों को खिलाते थे। सुरेश यादव के बाद नेताजी के किस्सों की भरमार है। वह कहते हैं कि नेताजी जब भी इटावा आते थे तो कोठी पर हमारे हमारे यहां की मिठाइयां और नाश्ता जरूर करते थे। एक बार का किस्सा सुनाते हुए कहा कि सैफई में देशभर के दिग्गज डॉक्टरों का कुंभ था। नेताजी ने फोन किया और कहा अपने यहां का बेहतरीन मेन्यू को लेकर घर आओ। वहीं बात होगी।

सुरेश कहते हैं, पहले तो वह डर गया कि नेताजी को क्या हो गया है। जानते तो हैं कि यहां क्या-क्या मिलता है फिर काहे मेन्यू मंगवा रहे हैं। फिर मेन्यू को थोड़ा और बढ़िया बनाकर नेताजी की कोठी पर पहुंच गए। उन्होंने शहरों में मिलने वाली तमाम मिठाइयों और स्नैक्स के बारे में बताया, नेताजी सब सुनते रहे। फिर आखिरी में बोले, अरे ये सब नहीं अपना बताओ। अच्छा छोड़ो तुम जलेबी-दही और रसमलाई का इंतजाम करो। बताया कि सेमिनार में डॉक्टरों को खिलानी है। जलेबियां देसी घी की बनी। उसके साथ कुछ और मिठाइयां भी लेकर गए। डॉक्टरों को खूब भाईं। इसपर नेताजी ने बुलाकर इनाम भी दिया था। सुरेश के बेटे शरद यादव का कहना है कि नेताजी दीपावली और अन्य त्योहारों पर इटावा से ही तमाम मिठाइयां पैक कराकर अपने दोस्तों, राजनीतिक नेताओं, सांसदों-विधायकों के लिए ले जाते थे। खासकर जनेश्वर मिश्र के लिए सोहन पापड़ी ले जाना नहीं भूलते थे।

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