Makar Sankranti 2022: आज से शुरू हुआ Kalpwas, जानें इसका महत्त्व

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देश भर में आज Makar Sankranti की धूम है। गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम स्थल पर 14 जनवरी को Makar Sankranti पर स्नान पर्व के साथ दुनिया के सबसे बड़े आध्यात्मिक और सांस्कृतिक ‘माघ मेला’ में आदिकाल से चली आ रही Kalpwas की परंपरा का नर्विहन किया जा रहा है। तीर्थराज प्रयाग में संगम तट पर पौष पूर्णिमा से Kalpwas आरंभ होकर माघी पूर्णिमा के साथ संपन्न होता है।

मिथिलावासी Makar Sankranti से अगली माघी संक्रांति तक Kalpwas करते हैं। इस परंपरा का नर्विहन करने वाले मुख्यत:बिहार और झारखंड के मैथिल्य ब्राह्मण होते हैं जिनकी संख्या बहुत कम होती है। पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक बड़ी संख्या में श्रद्धालु Kalpwas करते हैं। वैदिक शोध एवं सांस्कृतिक प्रतष्ठिान कर्मकाण्ड प्रशक्षिण केन्द्र के पूर्व आचार्य डा आत्माराम गौतम ने कहा कि पुराणों और धर्मशास्त्रों में Kalpwas को आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए जरूरी बताया गया है। यह मनुष्य के लिए आध्यात्म की राह का एक पड़ाव है, जिसके जरिए स्वनियंत्रण एवं आत्मशुद्धि का प्रयास किया जाता है।

हर साल कल्पवासी एक महीने तक संगम गंगा तट पर अल्पाहार, स्नान, ध्यान एवं दान करते हैं। बदलते वक़्त के अनुरूप Kalpwas करने वालों के तौर-तरीके में कुछ बदलाव जरूर आए हैं लेकिन Kalpwas करने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। आज भी श्रद्धालु कड़ाके की सर्दी में कम से कम संसाधनों की सहायता लेकर Kalpwas करते हैं।

Kalpwas की परंपरा आदिकाल से चली आ रही है। तीर्थराज प्रयाग में संगम के निकट पौष पूर्णिमा से Kalpwas आरंभ होता है और माघी पूर्णिमा के साथ संपन्न होता है। पौष पूर्णिमा के साथ आरंभ करने वाले श्रद्धालु एक महीने वहीं बसते हैं और भजन-ध्यान आदि करते हैं। Kalpwas मनुष्य के लिए आध्यात्मिक विकास का जरिया है। संगम पर माघ के पूरे महीने निवास कर पुण्य फल प्राप्त करने की इस साधना को Kalpwas कहा जाता है। मान्यता है कि प्रयाग में सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने के साथ शुरू होने वाले एक मास के Kalpwas से एक कल्प का पुण्य मिलता है।

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