होली स्पेशल: खास है उत्तराखंड की खड़ी और बैठकी होली

होली को रंगों का त्यौहार यूं ही नहीं कहा जाता। होली अपने आप में अबीर और गुलाल से सने चेहरे, पिचकारियों से रंगों की बौछार, दौड़ते-भागते और कूदते फांदते एक दूसरे पर रंग लगाते लोग और तरह तरह की मिठाईयों के साथ गुजिये की मिठास समेटे होती है। लेकिन इस बार कोरोना हमारे त्यौहारों पर मानों कुंडली मारकर बैठ गया है..लिहाजा इस बार कोरोना वाली होली में होली मनाने का अंदाज भी बदला-बदला नजर आएगा। अब यूं तो भारत में ही होली के एक से बढ़कर एक रंग देखने को मिल जाते हैं। चाहे वो पहाड़ की संस्कृति को दर्शाती उत्तराखंड की खड़ी और बैठी होली हो या फिर बिहार की फगुहा होली या ब्रज के बरसाना की लट्ठमार होली।

होली स्पेशल: सिर चढ़कर बोलता है बरसाना की लटमार होली का…

उत्तराखंड में होली मनाने का अंदाज ही निराला है। बसंत की शुरुआत से ही कुदरत के खिले-खिले रंग तो मानों को होली के रंगों को खुद में समेटे हुए होते हैं। यही वजह है कि देवभूमि उत्तराखंड में कुदरत के खिलते रंगों के साथ होली के रंगों का खुमार भी चढ़ने लगता है। खासकर कुमाऊं की होली तो अबीर गुलाल के अलावा यहां के संगीत के लिए मशहूर है। यहां का होली गायन भगवान गणेश की पूजा के साथ शुरु होता है और पशुपतिनाथ शिव की आराधना के साथ-साथ ब्रज के राधाकृष्ण की हंसी-ठिठोली के निराले अंदाज को भी खुद में समेटे होता है और फिर  आशीष वचनों के साथ होली गायन खत्म हो जाता है।  यहां होली भी दो तरह की होती है एक खड़ी होली और दूसरी बैठकी होली…बैठकी होली मंदिरों और घरों में गाई जाती है… इसमें महिलाओं की जो महफिल जमती है उसके तो क्या कहने…महिलाओं के अलावा पुरूषों की महफिल भी अलग से जमती है…महिलाओं की महफिल में नृत्य संगीत के अलावा खूब हंसी ठिठौली होती है वहीं पुरूष वाद्य यंत्रों के साथ टोलियों में होली के गीत गाते नजर आते हैं>

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