कोरोना पर भारी पड़ रहे फगुवा के गीत

होली हो और बिहार में चौपाल ना जमें। ऐसा तो हो ही नहीं सकता। होली के कुछ दिनों पहले से ही बिहार के गांव-गांव में महफिल जमनी शुरु हो जाती है। हर गांव टोले में फगुआ का चौपाल सजने लगता है और फिर ढोल और झाल की थाप के साथ शाम होते ही फगुवा चौपाल परवान चढ़ने लगती है और फिर देर रात तक चलती है। इस दौरान लोग हवा में अबीर गुलाल उड़ते नजर आते हैं और फगुआ के गीतों की धुन से सजी इस महफिल पर होली का खुमार चढने लगता है। होली के दिन हाथों में गुलाल लिए, पिचकारियों में रंग भरकर लोग फगुवा के गीत गाते हुए एक दूसरे को गुलाल लगाते हैं।

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वक्त के साथ अब बिहार में भी होली मनाने के तरीके में बदलाव आया है। जहां पहले बसंत पंचमी से ही फगुवा की चौपाल सजने लगती थी अब होली के तीन चार दिन पहले से ही चौपालें सजनी शुरु होती हैं। लेकिन हां भले ही वक्त के साथ तरीके में बदलाव हुआ हो लेकिन फगुवा के गीतों के साथ होली की जो महफिल सजती है वो आज भी रंगों के इस त्यौहार में चार चांद लगाने का काम करती है

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