Coronavirus ने सारे त्योहारों का मज़ा ख़राब कर दिया है। बावजूद इसके त्यौहार तो मनाना ही है। Bakrid (ईद-उल-अजहा) का नाम सुनते ही सिर्फ एक ही चीज़ का ख्याल आता है और वो है ‘बकरा’।

Bakrid पर सिर्फ बकरा काटना ही नही है ‘मकसद’

सबको यही लगता है कि Bakrid (ईद-उल-अजहा) के दिन सिर्फ एक ही काम किया जाता है वो है बकरों को काटना। ये बात सच है कि इस दिन बकरों को काटा जाता है लेकिन इसके पीछे की सच्चाई ज्यादातर लोग नही जानते हैं।

आइये जानते हैं इस दिन के मायने :-

‘कुर्बानी’ एक ऐसा शब्द है जिसका मतलब ही क़ुर्बान करना है यानी खुद से जुदा कर देना। एक बार हज़रत इब्राहिम ने ख्वाब में देखा कि अल्लाह ने हुकुम दिया है कि अपनी सबसे क़ीमती चीज़ को क़ुर्बान कर दो। हज़रत इब्राहिम के लिए सबसे क़ीमती चीज़ उनका बेटा इस्माइल था और क्यों न हो हर माँ बाप के लिए अपने बच्चों से ज़्यादा क़ीमती कुछ नहीं होता। कहा तो यहां तक जाता है कि हज़रत इब्राहिम को तीन दिनों तक ख्वाब में दिखा कि वो अपने बेटे को कुर्बान कर रहे हैं। इस ख्वाब की चर्चा उन्होंने अपने परिवार में की तो उनकी पत्नी और उनके बेटे इस्माइल ने उनको कहा कि आप अपने बेटे को कुर्बान कर दीजिये क्योंकि अल्लाह की ख़ुशी से ज़्यादा क़ीमती कुछ नहीं है जब सब अल्लाह का है तो उसको देने में हर्ज कैसा।

ईद-उल-अजहा एक अरबी भाषा का शब्द है जिसका मतलब “कुर्बानी” है… मायने “कुर्बानी की…

क़ुर्बानी का वक़्त नज़दीक आ गया लेकिन आप खुद ही सोचिये एक बाप अपने दिल के टुकड़े को आख़िर कैसे मार सकता है। अपने दिल को मज़बूत करते हुए हज़रत इब्राहिम ने अपनी आँखों पर एक पट्टी बांध ली, लेकिन अल्लाह भी रहीमो करीम है और वो अपने बंदे के दिल के हाल को बखूबी जनता है, जैसे ही हज़रत इब्राहिम छुरी लेकर अपने बेटे को क़ुर्बान करने लगे, वैसे ही फरिश्तों ने तेज़ी से इस्माइल को छुरी के नीचे से हटाकर उनकी जगह एक मेमने को रख दिया। जब उन्होने आँखों पर से पट्टी हटाई तब अपने बेटे को सही सलामत पाया। अल्लाह उनके इस जज़बे को देखकर बहुत खुश हुआ तब से हर साल लोग ये सोच कर की क़ुर्बानी करने से अल्लाह खुश होगा, बकरे की क़ुर्बानी देते हैं। लेकिन इस त्यौहार के दिन जानवरो की क़ुर्बानी सिर्फ एक प्रतीक है, असल क़ुर्बानी हर मुस्लिम के लिए दूसरों की मदद करना है।

आपके दिमाग में एक सवाल ज़रूर घूम रहा होगा कि हज़रत इब्राहिम आख़िर हैं कौन? हज़रत इब्राहिम को अल्लाह का बंदा माना जाता हैं, जिनकी इबादत पैग़ंबर(जो अल्लाह के दिए पैग़ाम को लोगों तक पहुंचाते हैं) के तौर पर की जाती हैं।
अक्सर लोगो को लगता हैं कि इस दिन सिर्फ बकरों की ही क़ुर्बानी दी जाती हैं लेकिन ऐसा नहीं हैं आपको बता दें कि इस दिन ऊंट, भेड़, बकरे की क़ुर्बानी दी जाती हैं लेकिन लोगों को लगता हैं कि Bakrid का मतलब ही बकरे की क़ुर्बानी देना हैं।

कुछ ज़रूरी बातें : कुर्बानी के कुछ नियम हैं जैसे उन जानवरों की क़ुर्बानी करना मकरूह (बुरा माना जाना) हैं जो घर में पला हो। अगर ऊंट हो तो 5 या 5 साल से ज़्यादा हो। बकरी या बकरा हो तो चाहिए कि 1 साल पूरा हो चुका हो और दूसरे साल में लग गया हो, अगर भेड़ या भेड़ा हो तो 6 महीने काफी हैं, अगर 7 महीने पूरे हो चुके हो तो बेहतर हैं। एक ज़रूरी बात और कि जानवर में कोई खराबी या उसके जिस्म में कोई ऐब (बुराई) न हो जैसे अँधा, काना लंगड़ा ,सींग टूटा, कान कटा हुआ, बीमार, बूढ़ा खस्सी भी न हो। सुन्नत हैं कि अगर ऊंट की क़ुर्बानी करें तो वो मादा हो, अगर भेड़ या बकरी हो तो नर हो।

AB STAR NEWS की तरफ से सभी पाठकों को Bakrid (ईद-उल-अजहा) की मुबारकबाद

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