जानें उस रहस्य के बारे में जिसके कारण साबित नही हो पाया की Mangal पर भी था ‘जीवन’

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एक ज़माने से हम सब यही सुनते आ रहे हैं कि Mangal पर भी कभी जीवन था। इस बात में कितनी सच्चाई है इसका पता लगाने के लिए वैज्ञानिक लगातार संकेत तलाशते रहे। वैज्ञानिकों को कई तरह के संकेत देखने को भी मिले हैं और अब तक के प्रमाण इस बात के स्पष्ट प्रमाण तो नहीं ही दे सके हैं कि यहां जीवन कभी नहीं था। ऐसे में अगर वाकई Mangal पर जीवन कभी था तो इसके प्रमाण क्यों नहीं मिल रहे हैं। बता दें कि ताजा शोध में इस सवाल का जवाब मिल गया है। शोधकर्ताओं को ऐसे संकेत मिले हैं जिनसे पता चलता है कि Mangal पर जीवन के प्रमाण कैसे नष्ट हुए होंगे।

तरल पदार्थों से नष्ट हो गए प्रमाण

स्पेन के सैंट्रो डि एस्ट्रोबायोलोजिया में कोर्नेल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के मुताबिक Mangal पर लोहे से संपन्न मिट्टी में छिपे जैविक प्रमाण कभी वहां की सतह पर बहने वाले अम्लीय द्रव्यों के कारण नष्ट हो गए होंगे।

प्रयोग से सामने आए ये तथ्य – शोधकर्ताओं ने मिट्टी और अमीनो एसिड से संबंधित सिम्यूलेशन्स किए जिससे वे Mangal पर बायोलॉजिकल पदार्थों के खत्म होने से संबंधि निष्कर्षों तक पहुंच सकें। उनका कॉन्सट्रेनिंगद प्रिजर्वेशन ऑफ ऑर्गेनिक कम्पाउंड्स इन मार्स एनालॉग नॉनट्रोनाइट्स आफ्टर एक्सपोजर टू एसिड एंड अलकलाइन फ्ल्यूड्स 15 सितंबर को नेचर साइंटिफिक रिपोर्ट में प्रकाशित हुआ है।

इस तरह किया गया प्रयोग –

  • सबसे पहले शोधकर्ताओं ने लैबोरेटरी में ही Mangal की सतह के हालातों को सिम्यूलेट किया।
  • उनका लक्ष्य मिट्टी में ग्लाइसिन नाम के अमीनो एसिड को सुरक्षित रखना था जिसका पहले अम्लीय द्रव्यों से सामना हुआ था।
  • शोधकर्ताओं ने बताया कि उन्होंने ग्लाइसिन का उपयोग इसलिए किया क्योंकि वह Mangal के वातावरण में बहुत जल्दी खत्म हो जाता है।
  • वहां उनके प्रयोगों के लिए एक आदर्श जानकारी देने वाला पदार्थ था।
  • Mangal की तरह लंबे विकिरण का सामना करने के बाद प्रयोगों से यह पता चला कि मिट्टी में ग्लाइसिन अणुओं का फोटोडिग्रेडेशन हो गया।
  • वहीं अम्लीय द्रव्यों ने मिट्टी की परतों का हटा दिया जिससे वह जेल जैसी सिलिका में बदल गई। इसका सीधा नतीजा यह हुआ कि मिट्टी में छिपे जैविक पदार्थ नष्ट हो गए। इसीलिए वैज्ञानिकों को मंगल पर जैविक पदार्थ मिलने में परेशानी हो रही है।

NASA का पर्सिवियरेंस रोवर अगले साल फरवरी में मंगल के जरीरो क्रेटर पर उतरेगा तो वहीं यूरोपीय स्पेस एजेंसी को रोसालिंद फ्रैंकलीन रोवर साल 2022 के अंत तक प्रक्षेपित होगा। बता दें कि पर्सिवयिरेंस अभियान में Mangal की मिट्टी के नमूनों का जमा किया जाएगा जिन्हें साल 2030 तक पृथ्वी तक लाया जाएगा। वही रोसालिंद फ्रैंकलीन रोवर Mangal की सतह से नमूने जमा करके वहीं उनका अध्ययन करेगा।

ध्यान देने वाली बात – Mangal पर जीवन की तलाश में लाल ग्रह की मिट्टी के नमूने अहम माने जा रहे हैं क्योंकि आणविक जैविक पदार्थ मिट्टी में ही सुरक्षित रह जाते हैं। लेकिन अगर पहले मिट्टी में एसिड की मौजूदगी रही हो तो इससे मिट्टी की जीवन के प्रमाणों को सहेजने की क्षमता पर बहुत बुरा असर पड़ा होगा।

इन द्रव्यों की वजह से आया होगा मिट्टी में बदलाव

कॉर्नेल में कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड साइंसेस में एस्ट्रोनॉमी विभाग के विजिटिंग वैज्ञानिक एल्बर्टो जी फेयरेन इस अध्ययन के कोरोस्पॉन्डिंग लेखक हैं। उनका कहना है, “हम जानते हैं कि अम्लीय तरल पहले Mangal की सतह पर बहा करते थे। इससे उन्होंने मिट्टी और उसकी जैविक सहेजने की क्षमता में बदलाव किया होगा। मिट्टी की आंतरिक संरचना परतों में बनी होती है जहां जैविक जीवन के प्रमाण जैसे कि लिपिड्स, न्यूक्लिक ऐसिड, पेप्टाइड्स और अन्य जैविकपॉलीमर जमा होकर सुरक्षित रह जाते हैं।

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