यूपी के बागपत में, जहां हिंडन और कृष्णा नदी का पानी धीरे धीरे जहरीला होता जा रहा है।

जल ही जीवन है यह बात हम बचपन से सुनते आ रहे है। लेकिन इसके बावजूद देश के कई हिस्से आज भी जल संकट से जूझ रहे है। कहीं पानी है नहीं और जहां है वहां का पानी धीरे-धीरे जहरीला होता जा रहा है। तो ऐसे में जल के बिना हमारे जीवन पर ही खतरा मंडराने लगा है। इन हालातों से जूझने के लिए सरकार द्वारा भी कई परियोजनाएं बनाई गई, कई ऐलान किए गए। लेकिन जब हम जमीनी हकीकत तलाशने जाते हैं तो परियोजनाएं तो कई है लेकिन समाधान एक भी नहीं।

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नदियों का पानी बना मौत की वजह
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जिदंगी जीने के लिए पानी का बड़ा महत्व होता है। लेकिन तब क्या किया जाए जब यह पानी जहर बनकर हमारी जिंदगी को नासूर बना दे। जी हां कुछ ऐसा ही मामला यूपी के बागपत में हमें देखने को मिला। जहां हिंडन और कृष्णा नदी का पानी धीरे धीरे जहरीला होता जा रहा है। जिसके चलते लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा है। लेकिन प्रशासन अपनी कुंभकरणीय नींद से जागने को तैयार ही नहीं है। जिसके चलते बागपत में हिंडन और कृष्णा नदी के किनारे बसे गांवों के लोग दहशत में जी रहे हैं। फैक्ट्रियों से निकला गंदा पानी कृष्णा और हिंडन नदियों में जाकर मिल रहा है, जो अब नंदियों से निकलकर गांव में लगे नलकूपों तक पहुंच रहा है। जिसके चलते ये दोनों नदियां अब फैक्ट्रियों के गंदे पानी की वजह से लोगों की मौत का कारण बन रही हैं। पिछले तीन साल में अब तक 20 से अधिक लोगों की कैंसर से जान जा चुकी है। गंदे पानी की वजह से कैंसर के अलावा लोग पेट दर्द, चर्म रोग समेत अन्य बीमारियों का शिकार हो रहे है। इस समस्या से लगभग आसपास के 55 से अधिक गांव प्रभावित हो रहे है।

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कभी जीवन देने वाली ये नदियां अब जहर उगल रही है इंसान तो इंसान, जीव-जतुं और फसलें भी इसके चलते प्रभावित हो रहे है। गांव में खेती करने वाले किसानों की मानें तो इस पानी को सिंचाई के लिए इस्तेमाल करने से इसका असर फसल की पैदावार पर भी पड़ रहा है। जिसके चलते गांव के लोग बिमार पड़ रहे है। जिसका सबसे ज्यादा असर बागपत के बरनावा गांव में देखने को मिला है।

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जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की मानें तो बागपत के सीएमओ डॉक्टर सुषमा चंद्रा ने इस बात से साफ इंकार कर दिया की बिमारी की वजह गंदा पानी है। उनका कहना है कि जिले में कोई भी व्यक्ति प्रदूषित जल के सेवन करने से बीमार नहीं हुआ है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार फसलों के पैदावार में अधिक मात्रा में रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग करने की वजह से ग्रामीणों में बीमारियां फैल रही हैं।

एनजीटी ने उठाए सख्त कदम

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नदियों के पानी को साफ सुथरा रखने के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा निर्मल हिंडन, नमामि गंगे और पानी बचाओ अभियान समेत कई योजनाएं चलाई जा रही है। लेकिन बात जब जमीनी हकीकत की करें तो तस्वीरों में कुछ और ही नजारा देखने को मिलता है। ऐसा भी नहीं है इस समस्या से निपटने के लिए अब तक कोई भी कदम नहीं उठाए गए है। इस समस्या से निपटने के लिए एनजीटी ने शुद्ध पानी सप्लाई का प्लान तैयार किया था। जिसके तहत प्रभावित इलाकों में साफ पानी की सप्लाई के लिए एनजीटी ने 8 अगस्त 2018 को 124 फैक्ट्रियां  को बंद करवाया था। इसके बाद भी जब एनजीटी के आदेशों को नहीं माना गया। तो एनजीटी ने 16 मार्च 2019 को प्रशासन को जमकर फटकार लगाई और यूपी सरकार को पांच करोड़ रुपये केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में जमा करने का आदेश भी दिया।

फैक्ट्रियों से निकला गंदा पानी लोगों की मौत का कारण

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एक रिपोर्ट की माने तो नदियों के पानी को दूषित करने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार वहां चल रही मिल और फैक्ट्रीयां है। यह नदियां करीब 170 चीनी मिलों और पेपर फैक्ट्रियों के केमिकल युक्त पानी की वजह से प्रदूषित हो रही हैं। वहीं नदी का गंदा पानी हैड़पंपों के माध्यम से घरों तक पहुंच रहा है, जिससे ग्रामीण बीमार हो रहे हैं। लेकिन इन सब के बावजूद भी इस समस्या का अंत होता नहीं दिख रहा है।