अयोध्या में राम मंदिर के लिए मुसलमानों के पक्ष में जा रहा है सुप्रीम कोर्ट? पढ़ें सुप्रीम कोर्ट का बयान

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अयोध्या में राम मंदिर के लिए मुसलमानों के पक्ष में जा रहा है सुप्रीम कोर्ट?

निर्मोही अखाड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को दलील दी कि 1934 से ही किसी मुसलमान को राम जन्मस्थल में प्रवेश की अनुमति नहीं थी।

आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक एवं आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और वरिष्ठ अधिवक्ता एवं प्रख्यता मध्यस्थ श्रीराम पांचू ने बृहस्पतिवार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में कहा था कि हिंदू और मुस्लिम पक्ष इस पेचीदे विवाद का समाधान ढूंढने में सफल नहीं रहे। इसके बाद राम मंदिर और बाबरी मस्जिद के विवाद में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई नियमित रूप से शुरू हो चुकी है।

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सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की है कि 1946 से पहले मुसलमान यहां नियमित रूप से नमाज पढ़ते थे यह हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था। वहीं निर्मोही अखाड़ा की ओर से कहा गया कि 1934 से 1949 तक मुसलमान विवादित ढांचे में जुमे की नमाज अदा करते थे। निर्मोही अखाड़ा के वकील ने भूमि विवाद मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के निष्कर्षों का हवाला दिया। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने निर्मोही अखाड़ा के वकील से कहा कि वह अपनी दलीलों को दीवानी विवाद मामले तक ही सीमित रखें। वहीं मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश अधिवक्ता राजीव धवन से सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत किसी की दलीलों को छोटा नहीं करना चाहते, अदालत की गरिमा बनाए रखें।

निर्मोही अखाड़ा ने सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को दलील दी कि 1934 से ही किसी मुसलमान को राम जन्मस्थल में प्रवेश की अनुमति नहीं थी, और उस पर सिर्फ निर्मोही अखाड़ा का नियंत्रण था। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ को निर्मोही अखाड़ा का पक्ष रख रहे वरिष्ठ अधिवक्ता सुशील जैन ने बताया कि वह क्षेत्र पर नियंत्रण और उसके प्रबंधन का अधिकार चाहते हैं। अखाड़ा के वकील ने शीर्ष अदालत को बताया कि उनका वाद मूलत: वस्तुओं, मालिकाना हक और प्रबंधन अधिकारों के बारे में है।

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सुनवाई शुरू करते हुए शीर्ष अदालत ने मामले की कार्यवाही की रिकॉर्डिंग या सीधे प्रसारण की मांग वाली आरएसएस के पूर्व विचारक के एन गोविंदाचार्य की अर्जी खारिज कर दी थी।  इस पीठ में न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस ए नजीर भी शामिल हैं।  पीठ ने तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल की रिपोर्ट पर दो अगस्त को संज्ञान लिया था कि करीब चार महीने तक चली मध्यस्थता की कार्यवाही में कोई अंतिम समाधान नहीं निकला।

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