Mamata vs Suvendu: नंदीग्राम की धरती पर हार का मतलब है सुनहरे सियासी करियर पर ग्रहण

 कोलकाता

डेढ़ दशक बाद एक बार फिर एक और ‘जमीन’ बचाने का संग्राम नंदीग्राम की जमीन पर लड़ा जा रहा है। मार्च, 2007 में सरकारी अधिग्रहण से अपनी खेतिहर उपजाऊ जमीन बचाने के लिए लोगों ने अपनी जान देकर जंग लड़ी थी और अब उसी आंदोलन के ‘साथी’ रहे दो नेता अपनी सियासी जमीन पर कब्जा बरकरार रखने की लड़ाई लड़ रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि साथ मिलकर भूमि आंदोलन करने वाले दो महारथी ममता बनर्जी और सुवेंदु अधिकारी एक-दूसरे के खिलाफ नंदीग्राम की जमीन पर अपना सियासी जीवन दांव पर लगा रखे हैं। दोनों को पता है कि नंदीग्राम की धरती पर हार का मतलब है उनके सुनहरे सियासी करियर पर ग्रहण।

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15 वर्ष पहले की तरह ही इस बार फिर लोगों की जुबान पर रेयापाड़ा, गोकुलनगर, सोनाचूड़ा के साथ तेखाली, कालीचरणपुर और उससे लगे खेजुरी के नाम हैं। सियासतदां, मीडिया, स्थानीय पुलिस और केंद्रीय बलों का जमावड़ा और इन सबकी भागदौड़ से उड़ती धूल बता रही है कि नंदीग्राम में इतिहास खुद को दोहरा रहा है। सड़क-चौराहा, दुकान-बाजार से लेकर घर-दुआर और खेत-खलिहान तक मुख्यमंत्री व तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व भाजपा प्रत्याशी सुवेंदु अधिकारी के पोस्टर, होìडग्स, कटआउट से पटे हैं। तृणमूल और भाजपा के झंडे से भी पूरा नंदीग्राम विधानसभा क्षेत्र अटा पड़ा है। हर तरफ साउंड बाक्स और लाउडस्पीकर का शोर है। ऐसा लग रहा है कि असली चुनावी संग्राम तो नंदीग्राम में ही हो रहा है।

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