जानिए कौन हैं पेरियार, लेनिन के बाद पेरियार की मूर्ति को बनाया निशाना

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जानें- कौन हैं पेरियार, लेनिन के बाद जिनकी मूर्ति को बनाया निशाना

पेरियार का जन्म 17 सितंबर 1879 में मद्रासी परिवार में हुआ था। उनका पूरा नाम ईवी रामास्वामी नायकर था और वो गांधी से भी प्रभावित थे। साल 1919 में वो कांग्रेस में शामिल हुए थे, लेकिन 1925 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। उनका यह मानना था कि सरकार ब्राह्मण और उच्च जाति के लोगों का हित साधती है आज़ादी से पहले और इसके बाद के तमिलनाडु में पेरियार का गहरा असर रहा है, और राज्य के लोग उनका बहुत सम्मान करते हैं।

रामास्वामी का तमिलनाडु के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्यों पर असर इतना गहरा है कि कम्युनिस्ट से लेकर दलित आंदोलन विचारधारा, तमिल राष्ट्रभक्त से तर्कवादियों और नारीवाद की ओर झुकाव वाले सभी उनका सम्मान करते हैं, और उन्हें मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं।

उन्होंने जाति प्रथा बरकरार रहने के विरोध में तमिलनाडु को अलग देश बनाने की कल्पना भी पेश की थी।

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ई।वी। रामास्वामी एक तमिल राष्ट्रवादी, राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता थे। इनके प्रशंसक इन्हें आदर के साथ ‘पेरियार’ संबोधित करते थे। इन्होने ‘आत्म सम्मान आन्दोलन’ या ‘द्रविड़ आन्दोलन’ शुरू किया था। उन्होंने जस्टिस पार्टी का गठन किया जो बाद में जाकर ‘द्रविड़ कड़गम’ हो गई। वे आजीवन रुढ़िवादी हिन्दुत्व का विरोध करते रहे और हिन्दी के अनिवार्य शिक्षण का भी उन्होने घोर विरोध किया। उन्होंने दक्षिण भारतीय समाज के शोषित वर्ग के लिए आजीवन कार्य किया।

उन्होंने ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों पर करारा प्रहार किया और एक पृथक राष्ट्र ‘द्रविड़ नाडु’ की मांग की। पेरियार ई।वी। रामास्वामी ने तर्कवाद, आत्म सम्मान और महिला अधिकार जैसे मुद्दों पर जोर दिया और जाति प्रथा का घोर विरोध किया। उन्होंने दक्षिण भारतीय गैर-तमिल लोगों के हक़ की लड़ाई लड़ी और उत्तर भारतियों के प्रभुत्व का भी विरोध किया। उनके कार्यों से ही तमिल समाज में बहुत परिवर्तन आया और जातिगत भेद-भाव भी बहुत हद तक कम हुआ। यूनेस्को ने अपने उद्धरण में उन्हें ‘नए युग का पैगम्बर, दक्षिण पूर्व एशिया का सुकरात, समाज सुधार आन्दोलन के पिता, अज्ञानता, अंधविश्वास और बेकार के रीति-रिवाज़ का दुश्मन’ कहा।

त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति तोड़ने के बाद अब तमिलनाडु में बड़े समाज सुधारक रहे पेरियार की मूर्ति भी तोड़ दी गई। इस दौरान पेरियार की मूर्ति को तोड़ने में हथौड़े का इस्तेमाल किया गया था। आइए जानते हैं कौन थे पेरियार और उन्हें किस लिए याद किया जाता है।।।

पेरियार एक सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ थे। इसके अलावा उन्हें द्रविड़ राजनीति का जनक भी कहा जाता है। दलित चिंतक पेरियार ने जाति और धर्म के खिलाफ सबसे लंबी लड़ाई लड़ी थी। वे दलितों के आदर्श माने जाते हैं।

त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति तोड़ने के बाद अब तमिलनाडु में बड़े समाज सुधारक रहे पेरियार की मूर्ति भी तोड़ दी गई। इस दौरान पेरियार की मूर्ति को तोड़ने में हथौड़े का इस्तेमाल किया गया था। आइए जानते हैं कौन थे पेरियार और उन्हें किस लिए याद किया जाता है।।।

पेरियार एक सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ थे।

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पेरियार एक सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिज्ञ थे। इसके अलावा उन्हें द्रविड़ राजनीति का जनक भी कहा जाता है। दलित चिंतक पेरियार ने जाति और धर्म के खिलाफ सबसे लंबी लड़ाई लड़ी थी। वे दलितों के आदर्श माने जाते हैं।

1929-1932 से उन्होंने ब्रिटेन, यूरोप और रूस का दौरा किया। वहीं लाल 1939 में वो जस्टिस पार्टी के प्रमुख बने, जो कि कांग्रेस के प्रमुख विकल्प में से एक थी। 1944 में जस्टिस पार्टी का नाम द्रविदर कझकम कर दिया गया। यह पार्टी दो भाग द्रविड़ कझकम और द्रविड़ मुनेत्र कझकम में बंट गई।

1925 में आत्म सम्मान आंदोलन की शुरुआत की। करीब पचास साल पहले उनकी लिखी ‘सच्ची रामायण’ की वजह से काफी विवाद हुआ था। इस किताब में राम सहित रामायण के कई चरित्रों को खलनायक के रूप में पेश किया गया है।

उन्होंने जाति प्रथा बरकरार रहने के विरोध में तमिलनाडु को अलग देश बनाने की कल्पना भी पेश की थी।