फिर जागा डोपिंग का भूत, तो चलिए जानते है कि आखिर यह डोपिंग है क्या?

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अंतरराष्ट्रीय खेलों में डोपिंग का भूत एक बार फिर जाग गया है।

हाल ही में भारतीय टीम के युवा खिलाड़ी पृथ्वी शॉ के डोप टेस्ट में फेल होने के चलते एक बार फिर से डोपिंग पर चर्चा ने जोर पकड़ लिया है। जिसके चलते खेल मंत्रालय ने बीसीसीआई पर सख्त रवैया अपनाते हुए उसे भी नाडा (NADA) के अधीन कर लिया है। अब भारतीय क्रिकेटर्स का डोप टेस्ट नेशनल एंटी डोपिंग एजेंसी यानि नाडा करेगी।

ऐसा नहीं है कि डोपिंग का यह मकड़जाल केवल क्रिकेट तक ही सीमित है। क्रिकेट के अलावा अन्य खेल भी इससे अछूते नहीं रहे है। भारत के अलावा पूरे विश्व में डोपिंग का यह मायाजाल फैला हुआ है। जूनियर से लेकर सीनियर खिलाड़ी तक डोपिंग के मामलों में फंस चुके हैं।

क्या है ये डोपिंग ?

डोपिंग का इस्तेमाल आमतौर से खिलाड़ी ताकत बढ़ाने के लिए करते हैं। खेल का कोई भी क्षेत्र इससे अछूता नहीं है। डोपिंग को खिलाड़ी अलग-अलग दवाईयों के जरिये लेते हैं। जैसे स्टेरॉयड, पेप्टाइड हॉर्मोन, नार्कोटिक्स, डाइयूरेटिक्स, और बल्ड डोपिंग।

  • स्टेरॉयड – स्टेरॉयड का इस्तेमाल खिलाड़ी आमतौर से मांसपेशियों को बढ़ाने के लिए करते हैं। खिलाड़ी इसके लिए स्टेरॉयड का इंजेक्शन लेते हैं जिसकी मदद से वह उनके शरीर की मांसपेशियों को बढ़ा देता है। आपको बता दे कि स्टेरॉयड हमारे शरीर में पहले से मौजूद होता है।
  • पेप्टाइड हॉर्मोन – पेप्टाइड हॉर्मोन भी स्टेरॉयड की तरह शरीर में मौजूद होता है। खिलाड़ी इसका इस्तेमाल फैट घटाने के लिए करते है। इंसुलिन नाम के इस हार्मोन का इस्तेमाल करने से शरीर से फैट घटने लगता है और मसल्स बनने लगती है।
  • ब्लड डोपिंग – इसमें खिलाड़ी कम उम्र के लोगों का ब्लड लेकर खुद को चढ़ाते हैं। कम उम्र के लोगों के ब्लड में रेड ब्लड सेल्स ज्यादा होते है। जिसकी सहायता से खिलाड़ियों को ज्यादा ताकत मिलती है।
  • नार्कोटिक्स – डोपिंग में नार्कोटिक्स और मॉर्फीन जैसी दवाओं का इस्तेमाल खिलाड़ी ज्यादा करते हैं। यह एक दर्दनाशक दवा होती है, जिसका इस्तेमाल खिलाड़ी खेल के समय दर्द का अहसास होने के समय करते हैं।
  • डाइयूरेटिक्स – इस दवा का इस्तेमाल कुश्ती और बाक्सिंग जैसे खेलों में ज्यादातर किया जाता है। इसकी सहायता से खिलाडी आसानी से अपना वजन घटाकर कम वजन वाले वर्ग में एंट्री ले लेते है।

अंतरराष्ट्रीय खेलों में लगातार बढ़ रहे डोपिंग के मामलों को ध्यान में रखते हुए 10 नवंबर 1999 को वाडा (WADA – World Anti Doping Agency) की स्थापना की गई थी। जिसके बाद से हर देश में नाडा की भी स्थापना की जाने लगी। डोप टेस्ट में दोषी पाए जाने वाले खिलाड़ी पर 2 साल की सजा से लेकर आजीवन प्रतिबंध तक की सजा का प्रावधान है।

बात अगर भारत की करें तो भारत में डोपिंग का सबसे पहला मामला सन् 1968 में सामने आया था। उस समय दिल्ली के रेलवे स्टेडियम में 1968 के मेक्सिको ओलंपिक ट्रायल चल रहा था। ट्रायल के दौरान 10 हजार मीटर के ट्रायल में हिस्सा ले रहे कृपाल सिंह ट्रेक छोड़कर सीढ़ियों पर चढ़ गए और बेहोश हो गए। जब जांच की गई तो पता चला की उन्होंने नशीली दवाईयों का सेवन किया हुआ था।

इसके अलावा बात अगर क्रिकेट जगत की करें तो क्रिकेट में भी बहुत से दिग्गज खिलाड़ी डोपिंग के इस मायाजाल से बच नहीं पाये हैं। टीम इंडिया के धाकड़ बल्लेबाज यूसुफ पठान भी 2017 में डोपिंग के केस में फंस चुके हैं। उन्हें भी प्रतिबंधित पदार्थ टरबूटेलाइन लेने के लिए पॉजिटिव पाया गया था। जिसके चलते उन्हें पांच महीने के लिए निलंबित किया गया था।

दिग्गज ऑस्ट्रेलियाई स्पिनर शेन वार्न को 2003 विश्व कप के दौरान डोप टेस्ट में दोषी पाया गया था। जिसके चलते उन पर एक साल का प्रतिबंध लगाया गया था। तो वहीं पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर पर भी डोप टेस्ट की गाज गिर चुकी है। शोएब अख्तर पर 2006 में डोपिंग में फंसने का आरोप लगा था। जिसके चलते उन्हें 2 सालों के लिए क्रिकेट से दूर रहना पड़ा था।