लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों की मौत पर बड़े बड़े दावे करने वाली सरकार अपने वादों से मुकरी

आज शायद एक गरीब मज़दूर यही प्रार्थना कर रहा होगा कि भगवान कोई भी परेशानी दे दे लेकिन गरीबी न दें। कोरोना वायरस ने देश दुनिया में जो हंगामा बरपा किया वो किसी से छुपा नही है लेकिन सभी लोगों में प्रवासी मजदूरों को लॉकडाउन का जो असर झेलना पड़ा उनका दर्द बता पाना मुश्किल है। न जाने कितने ही प्रवासी मजदूरों की जान अपने वतन जाने के दौरान चली गई। उस वक़्त सरकार ने सभी मरने वाले मज़दूरों को मुआवज़ा देने की बात कही थी जिससे अब सरकार ने मुंह मोड़ लिया है।

पूरा मामला – संसद का मानसून सत्र) से शुरू हो गया है। कोरोना काल के चलते सदन में लिखकर सवाल जवाब किए जा रहे है।  सोमवार को सरकार से पूछा गया था कि क्या सरकार के पास अपने गृहराज्यों में लौटने वाले प्रवासी मजदूरों का कोई आंकड़ा है? विपक्ष ने सवाल में यह भी पूछा था कि क्या सरकार को इस बात की जानकारी है कि इस दौरान कई मजदूरों की जान चली गई थी और क्या उनके बारे में सरकार के पास कोई डिटेल है? साथ ही सवाल यह भी था कि क्या ऐसे परिवारों को आर्थिक सहायता या मुआवजा दिया गया है? इसपर केंद्रीय श्रम मंत्री संतोष कुमार गंगवार ने अपने लिखित जवाब में बताया कि ‘ऐसा कोई आंकड़ा मेंटेन नहीं किया गया है। ऐसे में इसपर कोई सवाल नहीं उठता है।’

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न भूलने वाली बात –

मार्च में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब देशभर में लॉकडाउन लगने का ऐलान किया था, जिसके बाद लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर बेघर और बिना रोजगार वाली स्थिति में आ गए थे, और पैदल ही घर जाने लगे थे। इस दौरान कई मजदूरों की एक्सीडेंट, भूख-प्यास और तबीयत खराब होने के कारण मरने की खबर भी आई थी। जिनकी मदद करने का दावा कर सरकार आराम से बैठ गयी है।

विरोध और विपक्ष की आलोचनाओं के बाद केंद्र ने राज्यों से बॉर्डर सील करने को कहा और उसके बाद मजदूरों के लिए श्रमिक ट्रेनें चलाई गईं। हालांकि, श्रमिक ट्रेनों को लेकर इतनी अव्यवस्था थी कि मजदूरों की पैदल यात्रा या रोड के जरिए यात्रा जारी रही और इस दौरान कई मजदूरों की रोड हादसों में जान चली गई। कइयों को उनके घर से निकाल दिया गया, जिसके बाद वो अपने गृहराज्य की ओर निकल पड़े थे। कुछ जो भी गाड़ी मिली, उससे आ रहे थे तो कुछ पैदल ही निकल पड़े थे। ये मजदूर कई दिनों तक भूखे-प्यासे पैदल चलते रहे। कइयों ने घर पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दिया था। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने मोदी सरकार के उस जवाब पर तीखा हमला बोला है, जिसमें सरकार ने कहा था कि उसके पास प्रवासी मजदूरों की मौत पर कोई आंकड़ा नहीं है। श्रम मंत्रालय ने लिखित जवाब में कहा था कि सरकार के पास लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों की मौत का आंकड़ा नहीं है, ऐसे में मुआवजे का सवाल नहीं उठता है।

प्रवासी मजदूरों को नहीं मिल रही पीएम के संसदीय क्षेत्र में कोई मदद, जिम्मेदार…

राहुल गांधी सरकार की प्रतिक्रिया पर मंगलवार को एक ट्वीट में लिखा कि ‘मोदी सरकार नहीं जानती कि लॉकडाउन में कितने प्रवासी मज़दूर मरे और कितनी नौकरियां गयीं। तुमने ना गिना तो क्या मौत ना हुई? हां मगर दुख है सरकार पर असर ना हुई, उनका मरना देखा ज़माने ने, एक मोदी सरकार है जिसे ख़बर ना हुई।’ विपक्ष ने ऐसे परिवारों के मुआवजे को लेकर संसद में यह मुद्दा उठाया है, लेकिन सरकार का कहना है कि चूंकि उसके पास प्रवासियों के मौत का कोई आंकड़ा नहीं है, ऐसे में ‘मुआवजे का सवाल नहीं उठता है।’

सरकार से प्रवासी मजदूरों के बारे में कई अहम सवाल किए गए – क्या सरकार प्रवासी मजदूरों के आंकड़े को पहचानने में गलती कर गई। क्या सरकार के पास ऐसा आंकड़ा है कि लॉकडाउन के दौरान कितने मजदूरों की मौत हुई है क्योंकि हजारों मजदूरों के मरने की बात सामने आई है। इसके अलावा सवाल पूछा गया कि क्या सरकार ने सभी राशनकार्ड धारकों को मुफ्त में राशन दिया है, अगर हां तो उसकी जानकारी दें। इसके साथ लिखित सवाल में कोरोना संकट के दौरान सरकार द्वारा उठाए गए अन्य कदमों की जानकारी मांगी गई। सरकार का रवैया देखकर तो ऐसा लगता है जैसे रात गई बात गई, कौन सा लॉकडाउन, कौन से मज़दूर हमें किसी से क्या। रही वादों की बात तो वादा तो किया ही तोड़ने के लिए जाता है।

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