केरल विधानसभा चुनाव (Assembly Election) इस बार जीत और हार दोनों ही स्थिति में लेफ्ट के लिए ऐतिहासिक साबित हो सकता है। दरअसल 2018 में लेफ्ट Tripura में अपने गढ़ से करीब ढाई दशक बाद बाहर हो गया था। वही पश्चिम बंगाल (West Bengal) में अब स्थितियां कमजोर (Weak) हैं और वो सत्ता (power) का एक मजबूत दावेदार भी नहीं। संसद में भी लेफ्ट फ्रंट की स्थिति बेहद कमजोर (Weak) है। इस वजह से CPM की अगुवाई वाले लेफ्ट फ्रंट के लिए केरल के चुनाव (Assembly Election) का महत्व किसी भी अन्य पार्टी या गठबंधन (alliance) से ज्यादा है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (pm modi) ने भले ही कांग्रेस (congress) मुक्त भारत की बात कही हो लेकिन वर्तमान (Current ) स्थिति लेफ्ट मुक्त भारत (India ) जैसी हो रही है। पिनराई विजयन (Pinarayi Vijayan ) की अगुवाई वाले लेफ्ट के सामने केरल चुनाव (Kerala election) अस्तित्व का सवाल भी है। सामान्य तौर पर दशकों से केरल में कांग्रेस की अगुवाई वाला UDF और CPM की अगुवाई वाला LDF बारी-बारी से सरकार (Government) बनाते रहे हैं। बीते 40 वर्षों में केरल (Kerala) में कोई गठबंधन लगातार दूसरी बार सत्ता  (power) में वापस नहीं लौटा है। लेकिन इस बार के Opinion Polls कुछ और कहानी बयान कर रहे हैं। पोल्स में LDF को बढ़त दिखाई गई है।

बीते कुछ चुनावों (Election) की बात करें तो लेफ्ट फ्रंट के लिए लोकसभा (Lok Sabha ) और निकाय चुनाव (Election) में मिले-जुले अनुभव रहे हैं। एक तरफ 2019 के लोकसभा चुनाव (Lok Sabha ) में फ्रंट को तगड़ा झटका लगा था और राज्य में सिर्फ एक सीट हाथ आई थी। लेकिन 2020 के निकाय चुनावों (Election) में LDF को जबरदस्त जीत मिली थी।

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