कलयुग में 135 साल बाद खत्म हो रहा वनवास

दिन तारीख सब तय हो गए… रह गया बस शिलान्यास… करने मंदिर का भूमिपूजन, पहुंचेंगे भारत प्रधान…

जी हां दिन-तारीख सब तय हो गया है, तारीख 5 अगस्त, दिन बुधवार, जब राम मंदिर निर्माण के भूमिपूजन के लिए खुद देश के प्रधानमंत्री आयोध्या जाएंगे. ये वो दिन और तारीख है जिस दिन पूरी दुनिया की निगाहें सिर्फ और सिर्फ अयोध्या पर होंगी. हो भी क्यों ना, आखिर सालों बाद रामलला का वनवास जो खत्म हो रहा है. तय मुहूर्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंदिर की नींव पूजा कर मंदिर का शिलान्यास रखेंगे. पूरी आयोध्या को दीपों से सजाकर फिर से दिवाली मनाने की भी तैयारी है अयोध्या ही नहीं दुनियाभर में साधु-संतों को दीप जलाने के लिए VHP ने तैयारी कर ली है. लेकिन क्या आप अयोध्या नगरी का धार्मिक महत्व जानते हैं, ये जानते हैं कि आखिर मर्यादा पुरुषोत्त्म भगवान राम के इस वनवास को खत्म होने में इतने साल क्यों लग गए. आइए जानते हैं सबसे पहले

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अयोध्या का धार्मिक महत्व

हिंदू पौराणिक मान्याताओं के अनुसार सप्त पुरियों में अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, कांची, अंवतिका और द्वारका को शामिल किया गया है. ये सभी सातों मोक्षदायिनी और पवित्र नगरियां यानी पुरियां हैं. चार वेदों में पहले अथर्ववेद में अयोध्या को ईश्वर का नगर माना है. अयोध्या में भगवान राम का जन्म हुआ था. अयोध्या नगरी सरयू नदी के किनारे पर बसा हुआ है. रामायण के अनुसार राजा मनु ने अयोध्या बसाई थी। अयोध्या का संबंध न सिर्फ भगवान राम से है बल्कि यहां बौद्ध, जैन और इस्लाम धर्म का भी है.

अयोध्या की स्थापना कैसे हुई?

स्कंद पुराण के अनुसार जिस तरह से काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है उसी प्रकार अयोध्या भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र पर विराजमान है. पौराणिक कथा के अनुसार मनु ने ब्रह्राजी से अपने लिए एक नगर के निर्माण की बात को लेकर उनके पास पहुंचे तब ब्रह्राजी जी उन्हें भगवान विष्णु के पास भेजा. तब भगवान विष्णु ने मनु के लिए साकेतधाम का चयन किया. साकेतधाम के चयन के बाद ब्रह्राजी और मनु के साथ विष्णुजी ने देवताओं के शिल्पकार विश्वकर्मा को भेज दिया. विष्णु जी ने महर्षि वशिष्ठ को भी भेजा. वशिष्ठ मुनि ने सरयू नदी के किनारे लीला भूमि का चयन किया. भूमि चयन के बाद देवशिल्पी नगर के निर्माण की प्रकिया आरंभ की. भगवान राम के जन्म के समय इस नगर का नाम अवध के रूप जाना जाता था. अयोध्या का एक नाम साकेत भी है. अयोध्या के अलावा कपिलवस्तु, वैशाली, मिथिला और कौशल में इक्ष्वाकु वंश के शासकों ने राजपाठ चलाया.

अब आपको बताते हैं कि राम जन्मभूमि का विवाद आखिर शुरु कहां से हुआ. इसका इतिहास कितना पुराना है. और पहला केस अदालत में कब पहुंचा. दरअसल इस मंदिर के विवाद का इतिहास अंग्रेजों के जमाने का है. माना जाता है कि इस पूरे विवाद की शुरुआत 1528 से होती है जब बाबर के सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान पर मस्जिद का निर्माण करवाया. हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में बताया है कि 1528-1731 के बीच इस स्थान पर कब्जे को लेकर हिंदू और मुसलमानों के बीच 64 बार संघर्ष हुए. फैजाबाद अदालत के मुलाजिम हफीजुल्ला ने 1822 में सरकार को भेजी एक रिपोर्ट में भी कहा था कि राम के जन्मस्थान पर मस्जिद बनवाई गई है. हिंदुओं और मुसलमानों के बीच तनाव को देखते हुए 1859 में ब्रिटिश हुकूमत ने इस जगह की घेराबंदी कर दी. अंदर का हिस्सा मुस्लिमों को नमाज के लिए और बाहर का हिस्सा हिंदुओं को पूजा के लिए दिया गया…वहीं इसका पहला मामला अदालत में कब पहुंचा उस इसके बारे में जान लेते हैं.

अदालत में कब पहुंचा मामला?

15 जनवरी 1885 ये वो दिन था जब पहली बार अदालत में इस जगह मंदिर बनवाने की मांग पहुंची. महंत रघुबर दास ने केस फाइल किया था. उन्होंने राम चबूतरा पर एक मंडप बनाने की इजाजत मांगी. 24 फरवरी 1885 को फैजाबाद की जिला अदालत ने उनकी अर्जी ये कहते हुए खारिज कर दी कि वो जगह मस्जिद के बेहद करीब है लेकिन, जज ने अपने फैसले में माना कि चबूतरे पर रघुबर दास का कब्जा है. उन्हें एक दीवार उठाकर चबूतरे को अलग करने को कहा. इसके बाद महंत रघुबर दास ने 17 मार्च 1886 को फैजाबाद के जिला जज कर्नल FEA कैमियर की अदालत में अपील दायर की. कैमियर ने अपने फैसले में कहा, “मस्जिद हिंदुओं के पवित्र स्थान पर बनी है, पर अब देर हो चुकी है. 356 साल पुरानी गलती को सुधारना इतने दिनों बाद उचित नहीं होगी। यथास्थिति बनाए रखें।”

जिसके बाद एक के बाद एक मामले मंदिर निर्माण के लिए अदालत पहुंची और आखिरकार लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद 9 नवंबर 2019 को वो दिन आ ही गया जब हिंदुओं को हक में फैसला आया और तय हो गया कि मंदिर का निर्माण वहीं होगा. जहां रामलला विराजमान हैं.

यहां एक दिलचस्प बात ये भी है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के हिंदुस्तान आने से पहले हिंदुस्तान में बाबरी मस्जिद राम मंदिर के विवाद का कहीं जिक्र नहीं आया… तमाम उपलब्ध दस्तावेजों से पता चलता है कि ये ईस्ट इंडिया कंपनी ही थी जिसने हिंदुस्तान को पहली बार बताया कि हिंदुओं तुम्हारे राम का मंदिर तोड़कर मुसलमानों ने बाबरी मस्जिद बना ली है.

ईस्ट इंडिया कंपनी के एजेंट को मिला भगवान राम का अवशेष

अयोध्या में 1611 में मिला था एजेंट विलियम फिंच को अवशेष

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ईस्ट इंडिया कंपनी का एजेंट विलियम फिंच इस धरती का पहला व्यक्ति है जिसने 1611 में अयोध्या में राम जन्म स्थान का अवशेष पाया था. मुगल शासन के खिलाफ जाकर उसने वहां पर बनी बाबरी मस्जिद का जिक्र नहीं किया है क्योंकि वह व्यापारी था. मगर उसने राम मंदिर के अवशेषों का जिक्र इसलिए किया क्योंकि वह जानता था कि हिंदुस्तान पर अगर राज करना है तो बिना हिंदू-मुसलमान विवादों के संभव नहीं है. बहरहाल अच्छी बात ये है कि अब तय समय पर मंदिर का भूमिपूजन होगा. जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे.

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