एक ऐसी नदी जो उगलती है Sona, कर देती है लोगों को मालामाल 

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मेरी देश की धरती, सोना उगले उगले हीरे मोती… ये गाना तो आपने सुना होगा। ये गाना कोई मज़ाक नहीं है बल्कि सही मायने में सच साबित होता है। देश में प्राकृतिक संपदाओं की इतनी भरमार है कि कई बार देश के लोग ही चकित हो जाते हैं। बहुत कम लोगों को पता होगा कि देश में एक नदी ऐसी भी है जिसके बारे में दावा किया जाता है कि वह अपने साथ Sona बहाकर लाती है।

इतना ही नहीं यह नदी जब Sona किनारे पर लगाती है तो लोग इसे निकालते हैं। कई परिवारों के लिए तो यह नदी जीविकोपार्जन का स्रोत भी है। इस नदी का नाम स्वर्णरेखा है और यह भारत के झारखंड राज्य से होकर बहती है। इसके अलावा स्वर्णरेखा नदी पश्चिम बंगाल और ओडिशा के भी अलग-अलग हिस्सों में सैकड़ों सालों से बह रही है। इसके नाम के पीछे की भी वजह दिलचस्प है। लोगों का मानना है कि यह नदी अपने साथ Sona लाती है इसलिए बहुत पहले ही इसका नाम स्वर्णरेखा रख दिया गया है। इसे सोने की नदी भी कहा जाता है।

इस नदी से Sona निकलता है यह बात सच है लेकिन वैज्ञानिकों को भी हैरानी यही कि स्वर्णरेखा में Sona कहां से निकलता है। स्थानीय प्रत्यक्षदर्शियों और एक्सपर्ट्स के दावे के मुताबिक नदी के बहाव के कई इलाकों में संभवतः सोने की कुछ खदानें हैं और स्वर्णरेखा उन खदानों से होकर गुजरती है। इसलिए घर्षण की वजह से सोने के कण इसमें घुल जाते हैं, जिसे आगे चलकर नदी किनारों पर लगा देती है। कई रिपोर्ट्स में इस नदी के उद्गम स्थल को रांची के पास बताया गया है। रांची से करीब सोलह किलोमीटर दूर नगड़ी स्थित रानीचुआं जगह से निकलकर स्वर्णरेखा नदी करीब 474 किलोमीटर की दूरी तय करती है। इस दौरान उद्गम स्थल से निकलने के बाद यह नदी किसी भी दूसरी नदी में जाकर नहीं मिलती है, बल्कि दर्जनों छोटी-बड़ी नदियां स्वर्णरेखा में आकर मिलती हैं। फिर यह नदी सीधे बंगाल की खाड़ी में जाकर गिरती है।

इतना सब होने के बावजूद भी कई आधिकारिक रूप से इस बात की पुष्टि नहीं हुई कि यह नदी कैसे और कब Sona लेकर आती है। हालांकि तमाम रिपोर्ट्स में बस इतना लिखा गया है कि स्वर्णरेखा सैकड़ों परिवारों का गुज़र-बसर करती है। झारखंड के स्थानीय आदिवासी इस नदी में सुबह जाते हैं। तमाड़ और सारंडा जैसे इलाके में रहने वाले आदिवासी इसमें लगे रहते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक नदी के आसपास रहने वाले लोग बताते हैं कि वे इसकी रेत से सोने के कण बीनते हैं और नदी के रेत से निकलने वाले सोने के कण गेंहू के दाने के बराबर होते हैं। हालांकि यह बहुत ही कम संख्या में मिलते हैं लेकिन कई बार ऐसा हुआ है कि काफी मशक्कत के बाद सोने के कण मिल जाते हैं।

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