दो हजार के महज एक गुलाबी नोट के लिए जब आप सुबह घर से निकलते थे तो शाम हो जाती थी चेहरे मुर्झा जाते थे

नई दिल्ली: सत्ता संभालने के 2 साल बाद जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2016 में नोट बंदी का ऐलान किया था तो पूरा देश कतारबद्ध तरीके से लाइनों में खड़े होकर जंग लड़ रहा था। दो हजार के महज एक गुलाबी नोट के लिए जब आप सुबह घर से निकलते थे तो शाम हो जाती थी चेहरे मुर्झा जाते थे और आप थक कर कहते थे हे राम ये कैसा बदलाव है। तब सरकार ने आपके परेशानी पर न्यू भारत का अमली जामा पहनाते हुए कहा था कि हमारे द्वारा लिए गया ये नोट बंदी का फैसला आने वाले बेहतर कल की नीव रखेंगे लेकिन नोटबंदी के तीन साल बाद के आंकड़े आपके सामने है।

‘नोटबंदी’ लंबी लाइनों का एक कथा जिसके 3 साल हुए पूरे

रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 में जहां दो हजार के 638 जाली नोट पकड़ में आये थे, तो वहीं  2017-18 में इनकी संख्या बढ़कर 17,938 हो गई है जाहिर है कि मोदी सरकार ने नोट बंदी के पीछे आतंकवाद को रोकना, कैशलेस सुविधा को बढ़ावा देना, सर्कुलेशन से पुराने नोटों को खत्म करना और नक्सलवाद को फंडिंग होने से रोकना था लेकिन इन सभी मामलों में अगर ताजा आकड़ा देखें तो कोई भी खास बदलाव नहीं दिखत हैं।

‘नोटबंदी’ लंबी लाइनों का एक कथा जिसके 3 साल हुए पूरे

सिवाया कैशलेस को कम तवज्जों देने के ऐसे में सरकार को नोटबंदी वाले फैसले पर विचार करते हुए उसके गुण और दोष दोनों को समझना होगा।

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