हर साल करीब एक लाख कश्मीरी युवक देश के अलग-अलग प्रदेशों में पश्मीना शॉल, सेमी पश्मीना, पूसा, एमपीशॉल, रफल शॉल, कप्तान शॉल, पुंछू, फिरन जैसे गर्म कपड़े बेचने जाते हैं।

Related image

जम्मु-कश्मीर में काफी लंबे समय से आतंकियों का खौफ था। सेना ने स्थानीय लोगों की मदद से यहां से आतंकियों का सफाया किया। इलाके में शांति तो हुई है लेकिन अभी आर्थिक समस्या बढ़ गई है।कश्मीर के एक गाँव सिंगली पुरा  के निवासियों ने बताया की हम गर्म कपड़े बेचने के लिए कपड़ों की गठरी बांधते हैं, लेकिन पता नहीं इस साल गांव और परिवार का खर्च कैसे चलेगा।

यहां के युवकों को आतंकियों के साथ-साथ दूसरे प्रदेशों में होने वाली मॉब लिचिंग का भय भी सता रहा है।

Image result for यहां के युवकों को आतंकियों के साथ-साथ दूसरे प्रदेशों में होने वाली मॉब लिचिंग का भय भी सता रहा है।

उन्होंने कहा कि नवंबर में गांव के ज्यादातर पुरुष देश के अलग-अलग प्रदेशों में कश्मीरी गर्म कपड़े बेचने चले जाते हैं। लेकिन इस बार दो वजहों से ये माल नहीं बेच पाएंगे। एक तो इस बार फोन सेवा बंद होने के कारण माल तैयार नहीं हो पाया है। दूसरा यहां के युवकों को आतंकियों के साथ-साथ दूसरे प्रदेशों में होने वाली मॉब लिचिंग का भय भी सता रहा है। हर साल नवंबर के महिने में कश्मीर के कई गाँव के लोग दिल्ली आ जाते थे। यहां दरियागंज में एक कमरे में सात से आठ कश्मीरी युवक रुकते थे, लेकिन बाकी माल की कमी के कारण काफी गाँव के लोग दिल्ली नहीं आ रहे हैं। बता दे कि इस बार 75 फीसदी कम कश्मीरी युवक देशभर में गर्म कपड़े बेचने जाएंगे। इस बार धंधा कम है।

कश्मीरी लोग अन्य प्रदेशों में बनाए गए अपने संपर्कों से व्हाट्सएप और फोन के जरिए करीब 50 फीसदी माल पहले ही बुक कर लेते हैं।

Related image

सूत्रों के मुताबिक हर साल करीब एक लाख कश्मीरी युवक देश के अलग-अलग प्रदेशों में पश्मीना शॉल, सेमी पश्मीना, पूसा, एमपीशॉल, रफल शॉल, कप्तान शॉल, पुंछू, फिरन जैसे गर्म कपड़े बेचने जाते हैं। कश्मीर घाटी में बड़गाम जिले के कश्मीरी फैंसी क्राफ्ट के चेयरमैन  नजीर अहमद लोन ने बताया कि अप्रैल से शॉल की अलग-अलग वैरायटी खरीद ली जाती है। जून में धुलाई, कटाई का काम शुरू कर देते हैं और जुलाई-अगस्त में डिमांड के हिसाब से माल तैयार किया जाता है। कश्मीरी लोग अन्य प्रदेशों में बनाए गए अपने संपर्कों से व्हाट्सएप और फोन के जरिए करीब 50 फीसदी माल पहले ही बुक कर लेते हैं। कई शॉल की वैरायटी ऐसी होती है जिसे तैयार करने में तीन माह से एक साल तक लग जाता है। जिसके लिए मशीनों की भी जरूरत पड़ती है। लेकिन पांच अगस्त के बाद से इंटरनेट बंद था।

हमें माल की डिमांड के बारे में पता नहीं चल पाया और न ही मशीनों के लिए दूसरे इलाके जा पाए। आमतौर पर एक सीजन में सामान्य कश्मीरी युवक 70 हजार से लेकर एक लाख रुपए तक कमा लेता है। निसार अहमद अनंतनाग जिले में दो दशक से गर्म कपड़ों का व्यापार कर रहे हैं। ये जिले की स्थानीय ट्रेड यूनियन के सदस्य भी हैं। निसार बताते हैं कि घाटी के व्यापारियों ने इस बार सिर्फ 10 फीसदी ही माल तैयार किया है। करीब एक चौथाई कश्मीरी हीइस बार बाहर माल बेचने जाएंगे। हालांकि कुछ व्यापारियों के पास पिछले साल का बचा हुआ माल है। सूत्रों के मुताबिक आतंकियों के द्वारा सेब ले जाने वाले ड्राइवरों के मारे जाने के बाद यहां के गर्म कपड़े बेचने में भय है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here