भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए के तहत राजद्रोह का प्रावधान किया गया है और इसकी आड़ में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में भारतीय नेताओं और राष्ट्रभक्तों को सजा दी थी।

भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए के तहत राजद्रोह का प्रावधान किया गया है और इसकी आड़ में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बड़ी संख्या में भारतीय नेताओं और राष्ट्रभक्तों को सजा दी थी। अंग्रेजों द्वारा इस कानून के बड़े पैमाने पर दुरुपयोग से इसके औचित्य पर समय-समय पर सवाल भी उठते रहे हैं। यहां तक आजादी के बाद भी इसके पक्ष-विपक्ष में आवाज उठी। दरअसल इस क़ानून में सज़ा के प्रावधान भी अंग्रेजों के समय के हिसाब से हैं।

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Image result for article 124Aइसीलिए आज भी जब कभी राजद्रोह के मामले सामने आते हैं। तो इस क़ानून की प्रासंगिता पर बहस तेज़ हो जाती है। जिसमें दोनों ही मत सामने आते हैं। बाकी क़ानूनों की मौजूदगी में इसकी ज़रूरत नहीं है तो दूसरा खेमा कहता है कि इसका अपना अलग प्रभाव है इसकी अपनी ज़रूरत है और ये बहस राजद्रोह से शुरू होकर देशद्रोह तक पहुंच जाती है। जिसकी परिभाषा बहुत ज़्यादा व्यापक है। हालांकि देश में कई तरह के अराजक तत्वों को देखते हुए सरकार इस कानून को हटाने के खिलाफ है। तो चलिए जानते हैं अखिर क्या है राजद्रोह और इसके तहत प्रावधान, इसका इतिहास ।

क्या है राजद्रोह का कानून?

इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) की धारा 124 ए में राजद्रोह की परिभाषा के अनुसार अगर कोई व्यक्ति सरकार-विरोधी सामग्री लिखता या बोलता है, ऐसी सामग्री का समर्थन करता है, राष्ट्रीय चिन्हों का अपमान करने के साथ संविधान को नीचा दिखाने की कोशिश करता है तो उसके खिलाफ आईपीसी की धारा 124 ए में राजद्रोह का मामला दर्ज हो सकता है। देश विरोधी संगठन के खिलाफ अगर कोई अनजाने में भी संबंध रखता है। संगठन का किसी भी तरीके से सहयोग करता है तो उसके खिलाफ भी राजद्रोह का मामला बन सकता है। इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर अधिकमत उम्र कैद की सजा का प्रावधान है।

इस धारा को खत्म करने वालों का पक्ष क्या है?

यह धारा संविधान में दिए गए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का दमन करती है। कानून के जानकारों का तर्क है कि संविधान की धारा 19 (1) ए की वजह से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगे हुए हैं। ऐसे में धारा 124ए की ज़रूरत नहीं है। जानकारों का तर्क है कि शांति व्यवस्था बिगाड़ने, धार्मिक उन्माद फैलाने और सामाजिक द्वेष पैदा करने जैसे अपराधों के लिए आईपीसी में पहले से ही अलग-अलग धाराओं में सजा का प्रावधान है। इसिलए अंग्रेजों के जमाने से चले आ रहे इस कानून को खत्म करना चाहिए।

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कितनी हो सकती है सजा?

इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर दोषी को 3 साल से लेकर अधिकमत उम्रकैद की सजा का प्रावधान है।

तो अगर कोई व्यक्ति इन गतिविधियों में पाया जाता हैं तो उसे इन धाराओं के तहत सजा मिलना तय है। साथ ही आपको बता दें कि कन्हैया और हार्दिक पर भी राजद्रोह का आरोप लगा था। जेएनयू में छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके साथी उमर खालिद पर राजद्रोह का केस दर्ज हुआ था। कांग्रेस के जमाने में 2012 में कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को संविधान से जुड़ी भद्दी और गंदी तस्‍वीरें पोस्‍ट करने की वजह से गिरफ्तार किया गया था और यही धारा लगाई गई थी।

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