ओणम के पहले दिन को उथ्रादम कहा जाता है, जबकि दूसरा दिन मुख्‍य ओणम यानी कि थिरूओणम कहलाता है।

ओणम यानि की केरल का सबसे धूमधाम से मनाए जाने वाला त्यौहार। पूरे साल दक्षिण भारतीय लोगों को इस दिन का बेसब्री से इंतजार रहता है। ये यहाँ का सबसे प्राचीन और पारंपरिक उत्‍सव है। जिसे खासतौर पर देश-विदेश से लोग मनाने के लिए केरल पहुंचते हैं।

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वैसे तो ओणम मनाने के पीछे दो बड़े कारण है, पहला कारण तो ये है कि वहां के लोग इसे फसलों के त्यौहार के रुप में मनाते हैं और इस त्यौहार में फसल की अच्छी उपज की कामना की जाती है।

दूसरा कारण, ओणम राजा बलि के स्‍वागत में भी मनाया जाता है। मान्‍यता है कि राजा बलि कश्‍यप ऋषि के पर-पर-पोते, हृणियाकश्‍यप के पर-पोते और महान विष्‍णु भक्‍त प्रह्नाद के पोते थे। वामन पुराण के अनुसार असुरों के राजा बलि ने अपने बल और पराक्रम से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। राजा बलि के आधिपत्‍य को देखकर इंद्र देवता घबराकर भगवान विष्‍णु के पास मदद मांगने पहुंचे तो भगवान विष्‍णु ने वामन अवतार धारण कर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंच गए। वामन भगवान ने बलि से तीन पग भूमि मांगी। पहले और दूसरे पग में भगवान ने धरती और आकाश को नाप लिया और अब तीसरा पग रखने के लिए कुछ बचा नहीं था तो राजा बलि ने कहा कि तीसरा पग उनके सिर पर रख दें। भगवान वामन ने ऐसा ही किया। इस तरह राजा बलि के आधिपत्‍य में जो कुछ भी था वह देवताओं को वापस मिल गया।

वहीं, भगवान वामन ने राजा बलि को वरदान दिया कि वह साल में एक बार अपनी प्रजा और राज्‍य से मिलने आ सकते हैं। राजा बलि के इसी आगमन को ओणम त्‍योहार के रूप में मनाया जाता है। राजा बलि हर साल ओणम के दौरान अपनी प्रजा से मिलने आते हैं और लोग उनके आगमन पर उनका स्‍वागत करते हैं।

ओणम का त्यौहार 10 दिनों तक मनाया जाता है, लेकिन इसमें पहले दो दिन सबसे महत्‍वपूर्ण होते हैं। ओणम के पहले दिन को उथ्रादम कहा जाता है, जबकि दूसरा दिन मुख्‍य ओणम यानी कि थिरूओणम कहलाता है। उथ्रादम के दिन घर की साफ-सफाई करने के बाद सजावट की जाती है। फिर थिरूओणम की सुबह पूजा की जाती हाई। इस साल ओणम का त्यौहार 1 सिंतबर से शुरु हुआ जो कि अब 12 सितंबर को खत्म होने जा रहा है।

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