इतिहास के पन्नों में दर्ज एक नाम अमृता प्रीतम जो एक जानी-मानी लेखिका और सुप्रसिद्ध कवित्री रही हैं, उनका जन्म आज ही के दिन गुजरांवाला, पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था।

इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज एक नाम अमृता प्रीतम जो एक जानी-मानी लेखिका और सुप्रसिद्ध कवित्री रही हैं, उनका जन्म आज ही के दिन ब्रिटिश भारत के गुजरांवाला, पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित एक अज़ीम शख्सियत थी अमृता प्रीतम।

उनकी 100वीं जयंती पर गूगल ने उनकी याद में एक सुंदर सा डूडल उन्हें समर्पित किया है। गूगल ने यह डूडल बहुत ही कलात्मक तरीके से पेश किया है जिसमें सिर पर दुपट्टा लिए शलवार-सूट में एक महिला कुछ लिख रही है। एक झलक देखने से ही मालूम पड़ जाता है कि यह डूडल किसी महिला लेखिका का है, पर असल में आज का गूगल डूडल प्रीतम की प्रसिद्ध आत्मकथा, काला गुलाब के संदर्भ में है। कहा जाता है कि अमृता प्रीतम को बचपन से ही लिखने का बहुत शौक था। 16 साल की ही उम्र में प्रकाशित हुआ था उनका पहला संकलन।

गूगल का नया डूडल, स्मृतियों का झरोखा: अमृत प्रीतम

सन् 47 का वो दौर जब बटवांरे की तलवार ने हिन्दोस्तान-पाकिस्तान के 2 हिस्से कर दिए थे। उस विभाजन की पीड़ा को अपने हृदय में समेटे अमृता प्रीतम ने कई कहानियां, लेख, निबंध, कविताएं और उपन्यास लिखे। विभाजन-त्रासदी का दर्द लिखा।

विभाजन के समय इनका परिवार दिल्ली आकर बस गया था। फिर कम उम्र में ही गृहस्थी की ज़िम्मेदारी सर पर आ पड़ी। 16 साल की उम्र में अमृता की शादी एक संपादक से हो गई। एक गृहस्थ जीवन बिताने के बाद अंतोगत्वा सन् 1960 में उन्होंने अपने पति से तलाक ले लिया।

बात अगर पुरस्कारों की करी जाय तो अमृता जी को एक अंतर्राष्ट्रीय मुक़ाम हासिल था। उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया, जिनमें प्रमुख हैं:

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1956 में साहित्य अकादमी पुरस्कार

1958 में पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा पुरस्कार

1988 में बल्गारिया वैरोव पुरस्कार (अंतरराष्ट्रीय)

1982 में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित पहली महिला का खिताब भी अमृता प्रीतम को जाता है। साथ ही 1969 में पद्मश्री सम्मान से भी सम्मानित किया गया।

31 अक्टूबर 2005, अमृता प्रीतम की लेखनी को हमेशा के लिए विराम लग गया। लंबी बीमारी के चलते 86 साल की उम्र में उनका निधन हो गया था।

उनकी कमी तो शायद कभी पूरी नहीं होगी पर उनके लिखे संस्करण उनकी स्मृतियों का झरोखा हैं। रसीदी टिकट, पिंजर सरीखी कई कहानियां में आज भी अमृता प्रीतम ज़िंदा हैं।

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