ईद-उल-अजहा एक अरबी भाषा का शब्द है जिसका मतलब “कुर्बानी” है… मायने “कुर्बानी की ईद”।

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क्या है बकरीद का महत्व ?
मिल- जुल कर मनाया जाता है बकरीद

ईद-उल-अजहा एक अरबी भाषा का शब्द है जिसका मतलब “कुर्बानी”  है… यानि कि “कुर्बानी की ईद”।

हमारे देश में अलग- अलग जाति–धर्म के लोग निवास करते हैं। पूरे वर्ष भर अलग- अलग त्यौहारों को हम सब बहुत ही हर्ष और उल्लास के साथ मिल–जुल कर मनाते हैं। उन्ही त्यौहारों में से एक है ईद-उल-अजहा जिसे हम कई नामों से जानते हैं – ईद-उल-जुहा, ईद उल अजहा और बकरीद… यह इस्लाम धर्म का एक प्रमुख त्यौहार है जिसे पूरी दुनिया के लोग मनाते हैं। यह त्यौहार विशेष तौर पर अभिवादन करने, लोगों से मिलने–जुलने और प्रार्थना करने का त्यौहार है।

क्या है बकरीद का महत्व ?
क्या है बकरीद का महत्व ?

ईद-उल-अजहा एक अरबी भाषा का शब्द है जिसका मतलब “कुर्बानी” है, यानि कि “कुर्बानी की ईद”। यह त्यौहार रमज़ान के पवित्र महीने के अंत से लगभग 70 दिनों के बाद मनाया जाता है। अरब देशों में इसे ईद उल जुहा नाम से जाना जाता है और भारतीय उप महादीप में इसे बकरीद के नाम से जाना जाता है।  लोगों का मानना है कि इस दिन बकरे की कुर्बानी दी जाती है इसीलिए इसे बकरीद कहते हैं। बकरे या किसी जानवर की कुर्बानी देना इस्लाम में बलिदान का प्रतीक माना गया है। जिसके पीछे हज़रत इब्राहिम और उनके बेटे इस्माइल के बलिदान की कहानी है।

कहानी ये है कि एक बार हज़रत इब्राहिम अलैय सलाम को सपना आया जिसमें अल्लाह की तरफ से उन्हें हुक्म मिला कि वे अपने प्रिय पुत्र हज़रत इस्माइल को अल्लाह के लिए कुर्बान कर दें।  यह अल्लाह का हुक्म इब्राहिम के लिए इम्तिहान बन गया और वे अल्लाह की बात को टाल न सके।  एक तरफ प्रिय पुत्र की कुर्बानी और दूसरी तरफ अल्लाह का हुक्म ।

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अल्लाह का हुक्म इब्राहिम के लिए सर्वोपरि था इसीलिए अंत में वे बेटे की कुर्बानी देने के लिए तैयार हो गए। लेकिन अल्लाह इब्राहिम के ह्रदय को समझ गए और जैसे ही इब्राहिम ने अपने बेटे को मारने के लिए छुरी उठायी तभी अल्लाह के फरिश्तों के सरदार जिब्रील अमीन ने इब्राहिम के बेटे इस्माइल को उस छुरी के नीचे से तुरंत हटा लिया और उसके नीचे एक मेमना रख दिया। इस प्रकार मेमने की कुर्बानी हुई और उनका बेटा बच गया। तब जिब्रील अमीन ने इब्राहिम को ख़ुशख़बरी सुनाई कि अल्लाह ने आपकी कुर्बानी कबूल कर ली है।

क्या है बकरीद का महत्व ?

तभी से हर साल इस दिन किसी न किसी जानवर की कुर्बानी दी जाती है। इस्लाम में लोगों की सेवा करने के लिए जान की कुर्बानी देने का महत्त्व है। इस्लाम में कुर्बानी देने का मतलब किसी अच्छे कार्य के लिए बलिदान देने से है। लेकिन जानवरों की कुर्बानी देना सिर्फ एक प्रतीक है। असल में बकरीद शब्द में अरबी भाषा के अनुसार ‘बकर’ का अर्थ है बड़ा जानवर। इसी शब्द को लोगों ने बकरा ईद बना दिया और बकरों की कुर्बानी देनी शुरू कर दी।

सूर्य उगने के बाद अदा होती है ईद की नमाज़

मस्जिद में लोग प्रार्थना करते हैं। सूर्य उगने के बाद नमाज़ अदा कर सकते हैं। प्रार्थनाओं और उपदेशों के समापन पर, मुसलमान एक दूसरे के साथ गले मिलते हैं और एक दूसरे को बधाई देते हैं और कहते हैं ‘ईद मुबारक’ साथ ही उपहार भी देते हैं। बहुत से मुसलमान अपने त्यौहारों पर अपने गैर-मुस्लिम दोस्तों, पड़ोसियों, सहकर्मियों और सहपाठियों को इस्लाम और मुस्लिम संस्कृति के बारे में बेहतर तरीके से परिचित कराने के लिए इस अवसर पर आमंत्रित करते हैं। सभी जगह हर्ष और उल्लास का माहौल देखने को मिलता है।

बकरीद को लेकर परंपराएँ और प्रथाएँ

पुरुषों, महिलाओं और बच्चों से अपेक्षा की जाती है कि वे ईदगाह या मस्जिद नामक एक खुली वक्फ (“रोक”) मैदान में एक बड़ी सभा में ईद की नमाज़ अदा करने के लिए अपने बेहतरीन कपड़ों में तैयार हों। महिलाएं विशेष तरह के पकवान इत्यादि बनाती हैं, जिसमें विभिन्न तरह के कुकीज़ शामिल हैं। सभी एक दूसरे को वितरित करते हैं, उपहार देते हैं और  बच्चों को ईदी भी दी जाती है। सभी इस त्यौहार को बड़े ही हर्ष और उल्लास के साथ मनाते है। यह त्यौहार हिजरी के आखिरी महीने जल हिज्ज में मनाया जाता है। इस महीने में दुनिया भर के मुस्लिम हज की यात्रा में जाते हैं। इस दौरान हज की यात्रा पर जाना बहुत ही शुभ माना जाता है। वास्तव में यह मुस्लिम को भाव–विभोर कर देने वाला दिन होता है।

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