मूली की खेती से नहीं हो रही कमाई तो ये तरीका आएगा आपके काम

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मूली

ऐसा माना जाता है कि यदि इंसान स्वस्थ रहता है तो सभी काम आसानी से कर सकता है। सब्जियां कुदरत की ऐसी देन है जिसकी हमें हर हाल में जरूरत है। ये हमारे शरीर को उर्जा प्रदान करती है, ऐसी ही एक सब्जी है मूली । यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण सब्जी है।

मूली कई तरीके से किसानों को अच्छे पैसे कमाने का मौका देती है। यह एक ऐसी फसल है जिससे किसान को कम समय में अधिक कमाई हो सकती है। लेकिन अच्छी पैदावार लेने के लिए खेती को सही तरीके से करना अनिवार्य है।

मूली

जलवायु :

मूली की बुवाई करने के लिए सर्द मौसम की आवश्यकता पड़ती है। आमतौर पर ये पूरे साल उगाई जा सकती है लेकिन यह ठन्डे मौसम की फसल है। इसके लिए कम से कम 10 से 15 डिग्री सेल्सियस अच्छा तापक्रम होता हैI इससे अधिक तापमान में इसकी जड़े कड़ी और स्वाद में ये कड़वी हो जाती है।

भूमि :

मूली वैसे तो मैदानी और पहाड़ी दोनों इलाको में बोई जाती है। मैदानी क्षेत्रों में मूली की बुवाई सितम्बर से जनवरी तक की जाती है। जबकि पहाड़ी इलाकों में यह अगस्त तक बोई जाती है। अच्छा उत्पादन के लिए दोमट या बलुई दोमट मिटटी अच्छी होती है।

खेत की तैयारी:

मूली की बुवाई करने से पहले खेत की 5-6 बार जुताई कर तैयार किया जाना जरुरी होता है। गहरी जुताई कि आवश्यकता होती है क्योंकि इसकी जड़ें भूमि में गहरी जाती है गहरी जुताई के लिए ट्रैक्टर या मिटटी पलटने वाले हल से जुताई करें।

खाद का प्रयोग:

मूली की अच्छी पैदावार लेने के लिए 200 से 250 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद खेत की तैयारी करते समय देनी चाहिए।

बीजोपचार:

बुवाई करने के लिए बीज 10 से 12 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है।  बीज का शोधन 2।5 ग्राम थीरम से एक किलोग्राम बीज की दर से उप शोधित करना चाहिए।

जल प्रबंधन:

मूली की फसल में पहली सिंचाई तीन चार पत्ती की अवस्था पर करनी चाहिए। मूली में सिंचाई भूमि के अनुसार कम ज्यादा करनी पड़ती हैI सर्दियों में 10 से 15 दिन के अंतराल पर तथा गर्मियों में प्रति सप्ताह सिंचाई करनी चाहिए।

फसल कटाई:

फसल 40 से 50 दिन में तैयार हो जाती है। जब लगे कि मूली की जड़ खाने लायक हो गयी है उस समय इसकी कटाई शुरू कर दे।

उपज:

उपज भूमि की उर्वरा शक्ति उसकी उगाई जाने वाली प्रजातियों और फसल की देख-भाल पर निर्भर करती है यूरोपियन प्रजातियों से 80-100 क्विंटल और एशियाई  प्रजातियों से 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिल जाती है।

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