एक ऐसा नेता जिसने ‘कटीली राजनीतिक शय्या’ पर लेटकर शिखर पर मुलायम को पहुंचाया

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शिवपाल यादव

आज हम एक ऐसे राजनेता की बात करने जा रहे है जिसने अपने बड़े भाई को शिखर पुरुष बनाने में पूरा राजनीतिक जीवन ही समर्पित कर दिया। ऐसा कहना गलत नहीं होगा कि जिस ऊंचाई पर आज मुलायम सिंह यादव है उसके पीछे शिवपाल की मेहनत और उनके जमीनी स्तर पर उतरकर काम करने से ही मुमकिन हो पाया है। तो चलिए आज हम बात करते है उसी किंगमेकर के बारे में जिसने मुलायम को देश का ‘नेता जी’ बना दिया।

शिवपाल सिंह यादव ये वही राजनेता है जिन्हें मुलायम सिंह यादव ने कभी ऊंगली पकड़ राजनीति में उतारा था। शिवपाल ने भी अपने बड़े भाई के लिए काफी कुछ किया। 70 के दशक में जब चंबल के बीहड़ जिले इटावा में राजनीति की राह आसान नहीं थी तो शिवपाल ने ही भाई मुलायम के लिए रास्ता तैयार किया था।

शिवपाल और मुलायम के बीच राजनीतिक रिश्ता

नेताजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले शिवपाल यादव पार्टी की सारी जिम्मेदारी अपने कंधों पर संभालते थे। वे बड़े भाई मुलायम के साथ अपने बचपन से ही सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे।

शिवपाल यादव

उन्होंने कई इलाकों में घूम-घूमकर गरीबों की मदद करना और उन्हें सुविधाएं मुहैया कराने का बीड़ा उठाया। मरीजों को अस्पताल पहुंचाना, थाना-कचहरी में गरीबों को न्याय दिलाने के लिए दिन रात एक कर देना। सही मायनों में अगर देखा जाए पार्टी विचारधारा से लोगों को जोड़ने का काम ग्राउंड लेवल पर शिवपाल ने ही किया है।

अपनी जवानी के दिनों में उन्होंने ने सोशलिस्ट पार्टी का शायद ही कोई कार्यक्रम छोड़ा हो। इसकी बड़ी वजह थी पार्टी में शिवपाल की तेजी से बढ़ी सक्रीयता। कभी नेताजी के चुनावों के पर्चें बांटने से शुरूआत करते हुए कैसे शिवपाल एक सक्रिय नेता की भूमिका में सामने आए यह समाजवादी पार्टी का इतिहास बयां करता है।

सपा में रहते शिवपाल यादव ने जितना कार्यकर्ताओं का ख्याल रखा, उतना किसी और नेता ने नहीं रखा। अखिलेश सरकार में मंत्री रहे तो ज्यादातर कार्यकर्ता उन्हीं से फरियाद करते थे। क्योंकि मुलायम सिंह यादव के साथ पार्टी की शुरुआत से हर जिले के बारंबार दौरे के चलते उन्हें जमीनी सच्चाई मालूम रहती थी।

शिवपाल जब बने पहली बार विधायक

1967 में जसवंतनगर से विधानसभा चुनाव जीतने के बाद मुलायम सिंह के राजनैतिक विरोधियों की संख्या काफी बढ़ चुकी थी। राजनैतिक द्वेष के चलते कई बार विरोधियों ने मुलायम सिंह पर जानलेवा हमला भी कराया।

यही वह समय था, जब हम शिवपाल सिंह और चचेरे भाई रामगोपाल यादव मुलायम सिंह के साथ आए। उन्होंने ने मुलायम सिंह की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी संभाली। शिवपाल ने 1988 में राजनीति में कदम रखा।

शिवपाल इटावा के जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष चुने गए। पहली बार 1996 में जसवंतनगर से जीतकर विधानसभा पंहुचे। इसके बाद इन्होंने अपनी विधायकी सफलतापूर्वक बरकरार रखी।

शिवपाल सिंह यादव ने मुलायम सिंह यादव के सहकारिता मंत्री रहते हुए पहली बार 77-78 में किसानों को एक लाख क्विंटल और अगले वर्ष 2.60 लाख क्विंटल बीज बांटे थे। उनके कार्यकाल में प्रदेश में दूध का उत्पादन तो बढ़ा ही, साथ ही पहली बार सहकारिता में दलितों और पिछड़ों के लिए आरक्षण की भी व्यवस्था की गई।

सहकारिता आंदोलन में मुलायम के बढ़े प्रभाव ने ही शिवपाल के लिए राजनीति में प्रवेश का मार्ग खोला। 1988 में शिवपाल पहली बार जिला सहकारी बैंक, इटावा के अध्यक्ष बने।

1991 तक सहकारी बैंक का अध्यक्ष रहने के बाद दोबारा 1993 में उन्होंने ने यह कुर्सी संभाली और अभी तक इस पर बने हुए थे। 1996 से विधानसभा सदस्य के साथ-साथ आज कई शिक्षण संस्थाओं के प्रबंधन भी करते हैं। वे एस एस मेमोरियल पब्लिक स्कूल, सैफई, इटावा के अध्यक्ष चुने गए।

प्रगतिशील समाजवादी पार्टी का किया गठन

शिवपाल सिंह यादव उत्तर प्रदेश की राजनीति का ऐसा चेहरा है, जिसके बारे में कोई भी भविष्यवाणी खतरे से खाली नहीं। पिछले 3 साल में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनके चाचा के बीच जो रिश्ते रहे हैं, उसके चलते पूरे देश और मीडिया की नज़रे हमेशा यादव परिवार पर बनीं रहीं हैं। ऐसे में जब शिवपाल ने सपा छोड़ कर अपनी एक नई पार्टी बनाई, तो तमाम अटकलों का दौर शुरु हो गया। शिवपाल के सपा से अलग होने का सीधा नुकसान अखिलेश यादव को ही हुआ।

पार्टी बनाने के महीने भर के भीतर ही शिवपाल यादव कई बड़े सपा नेताओं को जोड़ने में सफल रहे थे। इनमें ज्यादातर नेता मुलायम सिंह यादव के शुरुआती संघर्ष के दौर से साथी रहे हैं।

निश्चित तौर पर शिवपाल के लिए ये किसी धक्के से कम नहीं था कि जिस पेड़ रूपी समाजवादी पार्टी को उन्होंने सींचा और बड़ा किया, उसे किसी और ने छीनकर उसके फल खा लिए।

समाजवादी पार्टी का संगठन खड़ा करने वाले शिवपाल के लिए यह कहावत मशहूर थी कि, ‘सपा के पालक तो मुलायम हैं लेकिन चालक शिवपाल हैं।’

ठीक उसी तरह शिवपाल अब अपनी पार्टी प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के संगठन को मजबूत करने में लगे हुए हैं।

समाजवादी पार्टी से अलग हुए तो उन्होंने कहा था कि मैंने हमेशा नेताजी का सम्मान किया है, जिन्होंने सम्मान नहीं किया है, उन्हें करना चाहिए। जितने भी लोग समाजावादी पार्टी में हैं, सब उनकी वजह से हैं। ऐसे में जब उन्हीं का अपमान करोगे तो ये मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता हूं।

मैंने नेताजी से आशीर्वाद लेकर, उनसे बात करके ही ये फ़ैसला लिया है।

शिवपाल और अखिलेश के बीच तकरार

अखिलेश के अपने चाचा से रिश्ते क्यों और कब से बिगड़े? अपने जिस भाई को मुलायम सबसे ज्यादा मानते हैं, उसी चाचा शिवपाल से अखिलेश की कबसे ठनने लगी? अखिलेश के बचपन के पन्ने बताते हैं जब पिता मुलायम राजनीति में घनघोर व्यस्त रहा करते थे तो अखिलेश की घर और स्कूल की पढ़ाई की देख-रेख शिवपाल और उनकी पत्नी सरला ही करती थीं।

राजनीति के बीहड़ों में लड़ते हुए जब मुलायम सिंह की जान तक को ख़तरा था तो उन्होंने तब अपने एक मात्र पुत्र अखिलेश को सुरक्षा कारणों से स्कूल से निकाल कर घर बैठा दिया था।

जब चाचा-भतीजे का झगड़ा सड़क तक आया तब मुलायम ने कहा भी था कि अखिलेश को चाचा ने ही पाला है। साथ में उन्होंने यह भी जोड़ा था कि समाजवादी पार्टी बनाने में शिवपाल का बहुत बड़ा योगदान है।

अखिलेश पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में ख़ूब सक्रिय हुए। उन्होंने अपनी युवा टीम खड़ी की और सपा का रूपांतरण शुरू किया। शिवपाल ने कोई आपत्ति या नाराज़गी तब व्यक्त नहीं की लेकिन इसे अखिलेश के साथ उनके रिश्तों में खटास पैदा होने की शुरुआत मान सकते हैं।

साल 2012 के चुनाव में सपा को विधान सभा में पूर्ण बहुमत मिलने का श्रेय अखिलेश के हिस्से आया और बिल्कुल अचानक ही मुलायम ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाना तय किया। शिवपाल ने मुलायम के इस प्रस्ताव का सख्त विरोध किया। मुलायम ने कैसे उन्हें मनाया और साढ़े चार साल कैसे सरकार में खींचतान चली, यह सब ताज़ा इतिहास है।

चाचा-भतीजे के बचपन से चले आ रहे मीठे रिश्ते एक बार कड़ुवे हुए तो फिर बात बिगड़ती चली गई।

डिंपल के लिए छोड़ दी कन्नौज सीट

सपा से अलग होकर नई पार्टी प्रसपा बनाने वाले शिवपाल सिंह यादव ने दरियादिली दिखाई। कन्नौज से बहू डिंपल यादव के खिलाफ प्रसपा से जो उम्मीदवार उतारा था, उसने नामांकन ही नहीं कराया। मैनपुरी में बड़े भाई मुलायम के अलावा हर सीट पर सपा के खिलाफ प्रसपा का उम्मीदवार खड़ा करने की घोषणा की थी।

शिवपाल यादव

कन्नौज से डिंपल यादव के खिलाफ सुनील कुमार राठौर को उम्मीदवार बनाया था। इटावा निवासी सुनील के नाम से दो अप्रैल को नामांकन पत्र भी लिया गया था, लेकिन इसे दाखिल ही नहीं किया गया।

प्रसपा जिलाध्यक्ष मुनीर कुरैशी ने बताया कि शीर्ष नेतृत्व से जानकारी दी गई कि कन्नौज से पार्टी उम्मीदवार का नामांकन नहीं होगा। इसके पीछे क्या वजह है, नहीं बता सकते। 

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